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________________ (ज) ॥ चि ॥ १६ ॥ पांच पुत्र हता व माहरे रे, वली हो जरतार ॥ कर्मसंयोगे वह सहु ए मूया रे, नहीं जल पावणहार॥चि०॥१७॥ करजोमीने कुमर जणी कहे रे, महारे बहुली प्राथ॥पुत्र करीने था' तुजने रे, श्रावो महारी साथ ॥चि० ॥ १७॥ परउपकारी वात मानी तिहां रे, थाप्यो सलखु पुत ॥ घरनो नार दीयो सहु तेहने रे, घर पाण्यो निज सुत ॥ चि॥१॥ विविध प्रकारे गुंथे बेरखा रे, गुंथे नवसर हार ॥ फूलदमा गुंथे बहु नातिना रे, एम करे व्यापार॥चि॥२०॥काम करतां नारी न विसरे रे, बीजु नावे चित्त ॥ वन जश्ने वनराज पारडे रे, पूरवली तिण प्रीत ॥ चि०॥ १॥ सोहिला दहामा कुःखमां निर्गम्या रे, दिवस न लागे नूख॥राते सुतो वनराज वलवले रे, नारी केरे फुःख ॥ चि॥२२॥ हवे वलराज सुखे रहेतां थका रे, मन की, एकांत ॥ श्रीजिनोदय कहे नारी तणुं रे, सुणजो सहु वृत्तांत ॥चि०॥२३॥सर्व गाथा॥ २॥ ॥ ढाल पांचमी॥ ॥ नाहलीयाम जाजो गोरी रावट वटे रे॥ए देशी॥ ॥ प्रवहण पवने प्रेरीयो रे, वाला चाले दिन ने Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.005393
Book TitleHansraj Vacchraj no Ras
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1917
Total Pages114
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size7 MB
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