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________________ (४७) मंदिर, श्रावी करे आसास ॥ सयनसमय जाई सुवे, जिहांएक थंजो आवास ॥ सने ॥ १४ ॥ वति तिम प्राते सुरंगे थईने, खेश् तेहिज वेस ॥वलि तिमहिज सहुलोकने कहे,मुखथी आदेस आदेस॥सने॥१५॥ श्रोता जन सांजलजो सहको, आगल वात रसाल। मोहनविजयें कही जली, ए तो रूमी अढारमी ढाल ॥ सने ॥ १६ ॥ ॥दोहा॥ ॥ लोकमुखे सोजा घणी, निसुणी श्रवण नरेस ॥ जे योगण गाये जली, पुरमें बाले वेस ॥१॥अति उबक थयो निरखवा ॥ योगण केलं रूप ॥ मूक्यो सचिवने तेमवा ॥ पुरमाहें तणे नूप ॥२॥ सचिव नमी सामणी प्रते ॥ नाखे वयण उदार ॥ नृपति अतिश्रातुर अडे ॥ देखण तुम दीदार ॥३॥ तेमा टे करुणा करी ॥ नृपने करी सनाथ ॥ चलो पधा रो अलेखणी॥ द्यो वीणा मुफ हाथ ॥ ४ ॥ मन थी हरषी योगणी ॥ ऊठी लेश्वीण ॥ चलो सिताव श्म उच्चरे। आगल थ सुप्रवीण ॥५॥ खमा खम कहेतो सचिव ॥ पहोतो राजवार ॥ सामणि दिन श्रावती ॥ नृप साचवे श्राचार ॥ ६ ॥ दोडीन Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.005386
Book TitleMantung Raja ane Manvati Ranino Ras
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1906
Total Pages132
LanguageGujarati
ClassificationBook_Gujarati
File Size16 MB
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