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________________ शिला है / भूमिका के इस लेख में कहाँतक बतावें ? बताना संभव भी नहीं और योग्य भी नहीं। मूल ग्रंथ-यह काव्य-पढ़ने को सामने है ही / मैं संक्षेप में संकेत देकर इतना ही कहना चाहता हूँ कि महामहिम आचार्यवर का मुख्य उद्देश्य जैन धर्म और दर्शन का विवरण प्रस्तुत करते हुए और उसकी श्रेष्ठता प्रतिपादित करते हुए धर्ममय आचार का उपदेश देना है / इसलिए आवश्यक सारी बातें अत्यंत स्पष्ट हुई है। सुंदर शैली में अभिव्यक्त हुई है। पाठक के मन पर इनका अच्छा प्रभाव पड़ता है / अपने उद्देश्यपूर्ति में आपश्री को पूर्ण सफलता प्राप्त हुई है / इसलिए तो मैंने कहा है कि यह चरित्र निर्माण का काव्य है / लेकिन चरित्र निर्माण के गीत गाते गाते आपश्रीने काव्य को दुर्बोधि और भारी नहीं होने दिया। विवेचन पद्धति अत्यंत सुबोध, सरल और सुस्पष्ट है / दर्शन के तत्व बहुत सरल करके कहे गये हैं। स्पष्टता के लिए अनेक प्रसंग, अनेक उदाहरण और कुछ कथाएँ और अनेक उपमा रूपकों की योजना की गयी है। इन सबके कारण सरलता बढ़ी है और रोचकता भी। अलंकारों का तो इस काव्य में खजाना भरा पड़ा है / उपमा और केवल रूपक नहीं, साङ्ग रूपक भी, उत्प्रेक्षा, अपह्नुति, व्यतिरेक, उदाहरण, दृष्टान्त, अर्थान्तर न्यास, विभावना आदि अलंकारों के बीसों उदाहरण मिलेंगे। इन से काव्य अत्यंत श्रेष्ठ और प्रभावी बन गया है। उसकी शोभा भी बढ़ गयी है। अलंकारों के बिना काव्य की शोभा कैसी ? कवि केशवदासने कहा है ___ यद्यपि जाति सुलच्छनी, सुबरन सरस सुवृत्त / भूपण बिना न सोहइ, कविता वनिता मिल // अर्थात् कविता वनिता और मित्र भले ही उच्च जाति के हो, उत्तम लक्षणों से मंडित हो, अच्छे वर्णवाले हो, श्रेष्ठ हो और कीर्ति प्राप्त हो किन्तु अलंकारों के बिना वे शोभा नहीं देते। फिर भी अलंकार काव्य का सर्वस्व नहीं है। मुख्य है रस / इस काव्य में रसाभिव्यक्ति उत्कृष्ट रीति से हुई है। कविश्रेष्ठ संन्यस्त होने पर भी शृंगार रस को अभिव्यक्ति हेमचंद्र, गंगादेवी और लोकचंद्र के गृहस्थ जीवन के संदर्भ में यथास्थान हुई है। सुंदर है। लेकिन इस काव्य का मुख्य रस शान्त है। शान्त रस का स्थायी भाव निर्वेद है। निर्वेद के लिए इस काव्य में पूरी पार्श्वभूमि उपलब्ध है, क्यों कि इसकी प्रत्येक गाथा का मुख मानो मोक्ष मार्ग की ओर ही है। नायक लोकचंद्र मुनि हो जाते हैं और शुद्ध साधुत्व के लिए क्रांतिकारी कार्य करते हैं। साधु-शिथिलाचार को हटाकर वैराग्य की उच्च
SR No.004486
Book TitleLonkashah Charitam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhasilalji Maharaj
PublisherJain Shastroddhar Samiti
Publication Year1983
Total Pages466
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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