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________________ चमत्कार : एक भ्रमजाल जो भी नियम बनते हैं वे निर्वैयक्तिक और सार्वभौम होते हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि जहर को पीनेवाला व्यक्ति न मरे या उससे प्रभावित न हो। ऐसा नहीं हो सकता कि बबूल का बीज बोनेवाला आम खा सके । जो सिद्धान्त है वे सब के लिए एक बराबर हैं। सिद्धान्त मानी सिद्धि का फार्मूला। सिद्धान्त में नगद चाहिये, उधार नहीं। सिद्धान्तों के सामने चमत्कार का अपवाद नहीं हो सकता। मैंने जिन्दगी भर पाप किये हैं और अन्त में जाकर परमात्मा की शरण ले ली और कह दिया कि परमात्मा मुझे उबार दे। लेकिन परमात्मा उबार नहीं सकता। यह चमत्कार कदापि नहीं हो सकता कि परमात्मा शरणभूत पापी को उबार दे। यदि परमात्मा शरणभूत को उबारने का चमत्कार दिखा देंगे, तो किये हुए पाप को कौन भोगेगा? परमात्मा की शरण लेना यह हमारी सद्भावना है मगर अपनी नौका को हमें स्वयं ही खेना पड़ेगा, तभी परमात्म-तट प्राप्त हो पायेगा। अगर आदमी स्वयं पापों से छुटकारा पाने का प्रयास न करके मात्र परमात्मा भगवान से मुक्ति की प्रार्थना करना स्वयं को हीन, दीन और परापेक्षी बनाना है। बाइबिल में बताया है कि वह व्यक्ति स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं कर पायेगा, जो ईसा-ईसा पुकारता है बल्कि वह आदमी स्वर्ग के राज्य में प्रविष्ट हो पायेगा, जो परमपिता की इच्छा के अनुसार कार्य करता है। वस्तुतः सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दृष्टि और सम्यक् आचार ही परमात्मा तक पहुंचने का तरीका है, ऐसा कुन्दकुन्द ने नियमसार में लिखा है। परमात्मा न तो किसी को संसार से पार कर सकते हैं और न किसी प्रकार की उपलब्धि में सहयोगी है। यदि हमलोग ऐसे उद्धारक में निष्ठा करेंगे जो हमारी प्रार्थना से हमें पाप से उबार ले तो इससे सदाचार की महिमा को बड़ा भारी धक्का लगेगा। सब लोग पाप ही पाप करेंगे। पुण्य कोई नहीं करेगा। जब इच्छा हो चले जाओ परमात्मा के पास, परमात्मा पार लगा देगा। फिर क्यों न पाप करें? फिर तो चार्वाकियों की बात आ जायेगी कि क्या है पाप और पुण्य ? खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ-ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत। इस तरह तो नास्तिकता चरम सीमा तक पहुंच जाएगी। कुछ भी नहीं बचेगा इस चमत्कार के साथ । चमत्कारों का बवण्डर सब धूलिधूसरित कर देगा। इसलिए चमत्कार से हमको दूर होना है। इसीलिए भगवान् महावीर चमत्कार को नहीं मानते थे। और, उनके जीवन में एक भी ऐसा प्रसंग नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि महावीर चमत्कार में विश्वास रखते थे। चमत्कार को वणिक लोग मान सकते हैं, क्षत्रिय लोग नहीं। वणिक तो हर सौदा ही ऐसा करता है, जो असम्भव हो। जिसमें लागत कम; उपलब्धि अधिक हो। खरीद तो उधार और विक्रय नगद। वह अपने जीवन में यही चमत्कार मानता है। इसमें उसका बनियापन है, लेकिन महावीर क्षत्रिय थे—महावीर से पहले हुए तेवीस तीर्थ कर-ऋषभ से पार्श्व तक-वे भी क्षत्रिय थे। यही तो खास बात है। जैनियों Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003961
Book TitleSamasya aur Samadhan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandraprabhsagar
PublisherJityasha Foundation
Publication Year1986
Total Pages110
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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