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________________ (ए) ॥ अथ गद्रंली नाग पहेलो ॥ ॥श्रा गहूंलीमां मुनि श्रीश्रात्मारामजी (श्रानंद विजयजी) महाराजनुं जन्म चरित्र पण किंचित्मा त्र बताववामां आव्यु ॥ ॥सांजलजो रे मुनि संजमरागी, उपशम श्रेणे चडीया रे ॥ ए देशी ॥ नर्बु थयुं रे मारे सुगुरु प. धार्या,जिन आगमना दरीया रे॥ ए श्रांकणी॥ ज्ञान तरंगें खेहेरो लेता,ध्यान पवनथी जरीया रे॥जलु थयु रे ॥१॥ आज कालमा जे जिन भागम, दृष्टि पंथमा श्रावे रे॥गहन गहन तेहना जे अर्थो, प्रगट करीने बतावे रे ॥ ज० ॥२॥ शक्ति नहि पण न. क्ति तणे वश, गुण गावा उलसाईं रे ॥ कर्ण अमृत गुरु चरित सुणावी, आनंद अधिक वधावू रे॥ ज० ॥३॥ दक्षिण दिशि जंबूहीपमाहि, एहि जरतमोकार रे॥ उत्तर दिशि पंजाब देश जहां, लेहेरा गाम मनोहार रे ॥ नम्॥४॥ दत्रियवंश गणेशचंद घर, जन्म लीया सुख धामें रे॥ रूपदेवी कुदिशुक्तिमां, मुक्ताफल उपमाने रे ॥ ज ॥ ५ ॥ लघुवयमां पण लक्षणथी बहु, दीपंता गुरुराया रे ॥ संगतथी मती ढूंढक जनने, ढूंढकपंथ धराया ॥रे ॥०॥६॥सं Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003851
Book TitlePuja Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1818
Total Pages96
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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