SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 137
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ I o गंध रस स्पर्श रहित तु, अरूपी अविकार ; असंयोगी अमल अकृत्रिम, ध्रुव शास्वत एक सार | चे० ॥२॥ षड् गुण हानि वृद्धि चक्रात्मक, पर्यय वर्त्तना काल ; लोकाकाश प्रमाण प्रदेशी, क्षेत्र तणो रखवाल | चे० ||३|| स्वभावे प्रत्येक प्रदेशे, गुण गण अनंत अपार ; गुण गुण प्रति पर्याय अनंता, स्व पर उभय प्रकार | ० ||४|| प्रति पर्याये धर्म अनंता, अस्ति नास्ति अधिकार ; 1 ए ज्ञानादिक संपद तारी, जड़ त्यागी धर प्यार | चे० ||५|| ज्ञाता द्रष्टा साक्षी भावे, उपादान सुधार । कर्त्ता भोक्ता सहजानंद नो, अनुभव पंथ स्वीकार | ० | ६ || (७७) कीर्त्ति पद राग-धन्याश्री चेतनजी सुराचो तन नाम | चे० । क्षण स्थायी जड़ पर्यय ए तन, मल मूत्रादिक धाम. . . चेतनजी १ राखी शक्या नहीं स्थायी तीर्थंकर, चक्री नारायण राम.. चे० २ राख थये तन नाम किम्मत शी ? सरे अथी शुरु काम... चेतन ३ माटे तजो जड़ नाम भूमणता, काज सधे विण दाम... चेतनजी ४ देहातीत स्व निर्नामी पद, सहजानंद विश्राम.. चेतनजी ५ (७८) आत्म निन्दा पद राग - आशा महापापी ! संदर भाव उत्थापी...मुझ मुझ सम कोण अधम पर द्रव्ये उपयोग रमणता, आत्म हिंसकता व्यापी । १०८ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003818
Book TitleSahajanand Sudha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorChandana Karani, Bhanvarlal Nahta
PublisherShrimad Rajchandra Ashram
Publication Year
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy