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सम्मतिप्रकरण - नयकाण्ड १
यत्र हि साधनज्ञानपूर्वक मर्थक्रियाज्ञानमुत्पद्यते तत्राऽवस्तुशंका नैवाऽस्ति । न ह्यनग्नावग्निज्ञाने संजाते प्रवृत्तस्य दाहपाकाद्यर्थक्रियाज्ञानस्य सम्भव इत्यागोपालाङ्गनाप्रसिद्धमेतत् । न च स्वप्नार्थक्रियाज्ञानमर्थक्रियाभावेऽपि दृष्टमिति जाग्रदर्थक्रियाज्ञानमपि तथाऽऽशंकाविषयः । तस्य तद्विपरीतत्वात् । तथाहि स्वप्नार्थक्रियाज्ञानम् अप्रवृत्तिपूर्वं व्याकुलमस्थिरं च तद्विपरीतं तज्जाग्रदशाभावि, कुलस्तेन व्यभिचारः !
पारमार्थिक सत् पदार्थ नहीं किन्तु क्या संवृति स्वरूप आभास - ज्ञान मात्र से अर्थक्रिया यानी जल प्राप्ति निष्पन्न हुई ?
किन्तु इन प्रकार की चिन्ताओं का अर्थक्रिया के अर्थात् जल प्राप्ति आदि के अर्थी को कोई प्रयोजन नहीं होता । प्रयोजन न होने का कारण यह है कि उसके वाञ्छित फल सिद्ध हो गया है, जल प्राप्ति हो गई है ।
( तथयेमपि किं वस्तु .... ) जिस प्रकार जलार्थी को जलज्ञान के अनन्तर जलप्राप्ति स्वरूप अर्थक्रिया से निस्बत है और किसी शंका-कुशंका से नहीं, इस प्रकार यहां भी विज्ञान के बाद जो अर्थक्रिया का संवेदन होता है इसमें भी क्या वह अर्थक्रिया सचमुच वस्तुसत् यानी वास्तविक होने पर उसका संवेदन हुआ ? या उससे भिन्न अर्थात् अवस्तुभूत होने पर संवेदन हुआ ? ऐसी शंका नहीं होती है ।
( तृड्दाहविच्छेदादि..... ) देखिये, जलार्थी जल के पास जलपान करके तृप्त हुआ तब उसकी तृषा छिप गई, इष्ट-वांछित जो था वह सिद्ध हो गया, तब उसको तृषाशान्ति का संवेदन स्वानुभव सिद्ध है | अब क्या वह चिन्ता करेगा कि यह तृषा शान्ति रूप अर्थत्रिया का ज्ञान सवस्तु में हुआ है या असद् वस्तु में ? नहीं, इस चिन्ता का कोई फल नहीं ।
प्र० - जहां शंका होती है वहां भाव अभाव दोनों का ज्ञान होने से उसे निश्चय तो करना पडता है कि क्या वह ज्ञान वस्तु में हुआ है या अवस्तु में ?
०- ( अवस्तुनि ज्ञानद्वया.... ) अर्थक्रिया यह अगर सही पदार्थ न होती अर्थात् अवस्तु यानी मिथ्या वस्तु ही होती तो उसमें प्रमाण अप्रमाण दोनों प्रकार का ज्ञान नहीं हो सकता । जल प्राप्ति व इससे तृषाशान्ति हो गई तब वहां कौन चिन्ता करने बैठता है कि यह ज्ञान सचमुच जल प्राप्ति व तृषा शान्ति में हुआ या किसी मिथ्या वस्तु में हुआ ?
उ०
'अवस्तुनि ज्ञान यासंभवात्' ! अर्थात् जो वस्तु आकाशकुसुमवत् मिथ्या है असत् है- अलीक है उसके विषय में दो प्रकार का ज्ञान यानी विधि - निषेध उभय कोटि का संशयात्मक ज्ञान नहीं हो सकता, जैसे कि यहां आकाशकुसुम है या नहीं ? अथवा यह आकाशकुसुम है या नहीं ? इस प्रकार का संदेह नहीं हो सकता । वैसे ही अर्थक्रिया अगर असत् ही है तो उसके विषय में यह शंका नहीं हो सकती कि 'वह है या नहीं !
प्र० - भले वैसी शंका नहीं, किन्तु अर्थक्रिया स्वयं वस्तुसत् है या असत् ? ऐसी शंका तो हो सकती है न ?
उ०- नहीं, जहां अर्थक्रिया ज्ञान साधनज्ञान पूर्वक ही होता है वहां अवस्तु की शंका कदापि नहीं होती । उदाहरणार्थ-दूर से हमें अग्नि का ज्ञान हुआ 'वह ज्ञान प्रमाण है या अप्रमाण' यह शंका हो
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