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________________ (६१) सोल || बेनी सहियरो मली मंगल गाय के, वाजे झुंडु जिरे सोल || बेनी सत्रकित धरती सार के, प्रभु गुण आवे रे लोल || बेनी सूत्र सुणे मनजाव के, अरथने धारती रे लोल ॥ ३ ॥ बेनी प्रजुवंदन सुपसाय के, चिहुं गति चूरती रे लोल || बेनी सोह म गणधर पाट, परंपर शोजती रे लोल | बेनी चंद्रों दयरत्न गणधार के, लवणपुर राजता रे लोल ॥ बेनी चविध संघ सुपसाय के, मांहे गाजता रे लो ल ॥ ४ ॥ बेनी धर्मोपदेश सुणाय, मिथ्यात्वनें वारता रे लोल | बेनी शांतिचरित्र कहेवाय के, नविने तारता रे लोल || बेनी गहूंली करती जोय के, ललि ललि लूटणां रे लोल || बेनी सामायिक पोसह समुदाय, करे वली पूणां रे लोल ॥ ५ ॥ बेनी स्थानक तप आराधे, मन यति जावशुं रे लोल ॥ बेनी वली रोहणी तप अति जात्र के, पाले प्रेमशुं रे बोल || बेनी समेत शिखर गिरि नेटण, अलजो बेघं रे बोल || बेनी पुण्य पसायें तेह, मनो रथ सवि फल्या रे लोल ॥ ६ ॥ बेनी संवत जंगणी शें वीशमां, कारज साधीयां रे लोल ॥ बेनी चैत्र शुदि तेरशने, जोमे वांदीया रे लोल || बेनी कहें क Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003688
Book TitleGahuli Sangrahanama Granth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1908
Total Pages146
LanguageGujarati
ClassificationBook_Devnagari
File Size5 MB
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