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________________ (१३७) प्राणी रात्रि जोजन ॥ १॥ ए आंकणी ॥ अन्नद बावीसमां रयणी नोजन, दोष कह्या परधान ॥ तेणे कारण राते मत जमज्यो, जो होय हैडे सान रे॥ प्राणी ॥२॥ दान स्नान आयुध ने जोजन, एट लां राते न कीजे ॥ ए करवां सूरजनी साखे, नीति वचन समजीजे रे ॥ प्राणी ॥३॥ उत्तम पशु पं खी पण राते, टाले जोजन टाणो ॥ तुमे तो मान वी नाम धरावो, केम संतोष न आणो रे ॥ प्रा० ॥४॥ मांखी जु कीमी कोलीयावमो, जोजनमा जो आवे ॥ कोड जलोदर वमन विकलता, एवा रो ग उपावे रे ॥ प्राणी ॥५॥ उन्नु नव जीव हत्या करतां, पातक जेह उपायुं । एक तलाव फोडतां ते टर्बु, पुषण सुगुरु बतायुं रे ॥प्राणी ॥६॥ एक लोतर नव सर फोड्या सम, एक दव देतां पाप ॥ अठलोतर नव दव दीधा जिम, एक कुवणिज सं ताप रे ॥ प्राणी० ॥ ॥ एकसोचुम्मालीस नव लगे कीधा, कुवणिजना जे दोष ॥ कूडं एक कलंक दीयंतां, तेहवो पापनो पोष रे॥प्राणी ॥॥ एकसो एकावन लव लगे दीधां, कूमां कलंक अपार ॥ एक वार शील खंड्या जेहवो, अनरथनो विस्तार रे ॥ Jain Educationa International For Personal and Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003687
Book TitleStavanavali
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages162
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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