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________________ उरभ्रीय १३९ अध्ययन ७: श्लोक १३-१६ टि०२०-२५ 'कहावणे' का टिप्पण। 'वर्ष नयुत' वर्षों की संख्या देता है। 'नयुत' में जितने वर्ष होते २०. हजार (कार्षापण) (सहस्स) हैं उनका परिमाण इस प्रकार है'सहस्स' शब्द के द्वारा हजार कार्षापण उपलक्षित किए ८४००००० वर्ष १ पूर्वाड्क गए हैं। ऐसा चूर्णि और वृत्ति का अभिमत है।' कार्षापण एक ८४००००० पूर्वाङ्क १ पूर्व प्रकार का सिक्का है। इसका मान, जो धातु तोली जाती है उसके ८४००००० पूर्व १नयुतांग आधार पर भिन्न-भिन्न होता है। जैसे-यदि सोना हो तो १६ ८४००००० नयुतांग १ नयुत मासा, यदि चांदी हो तो १६ पण अथवा १२८० कौड़ियां, यदि (८४ लाख ४८४ लाख ४८४ लाख ८४ लाख) = १ तांबा हो तो ८० रक्तिकाएं अथवा १७६ ग्रेन आदि। नारद नयुत। अर्थात् एक नयुत में इतने-४६७८६१३६ ०००, ०००, (जिसका समय १०० और ३०० ई० के बीच में पडता है) ने ०००, ०००, ०००, ०००, ०० वर्ष होंगे। एक स्थान में कहा है कि चांदी का कार्षापण दक्षिण में चालू था २४. सौ वर्ष जितने अल्प जीवन के लिए (ऊणे वाससयाउए) और प्राच्य देश में वह २० पण के बराबर था और पंचनद प्रदेश इसका शाब्दिक अर्थ है-सौ वर्ष जितनी अल्प आयुष्य में चालू कार्षापण को वे प्रमाण नहीं मानते थे। विशेष विवरण की स्थिति में। चूर्णि के अनुसार भगवान् महावीर ने जब धर्म के लिए देखिए-२०॥४२ के 'कहावणे' का टिप्पण। का प्रतिपादन किया तब सामान्यतः मनुष्य की आयु सौ वर्ष की २१. (श्लोक ११) थी। यह आयु 'नयुत' की अपेक्षा बहुत न्यून है। वृत्ति के इस श्लोक में दो कथाओं का संकेत है अनुसार भगवान् महावीर के तीर्थ में मनुष्य प्रायः सौ वर्ष १. एक काकिणी के लिए सहन कार्षापण को हारना। जितनी न्यून आयु वाले होते थे। तुलना प्रस्तुत श्लोक में विषय और आयुष्य की तुलना की गई सीलव्वयाई जो बहुफलाई, तण सुखमहिलसही है। स्वर्ग की स्थिति दीर्घकालीन होती है। उसकी तुलना में मनुष्य पिइदुबलो तवस्सी, कोडीए कागिणिं किणई। जीवन की स्थिति अल्पकालीन बताई गई है। (उपदेशमाला श्लोक १९८) २५. (श्लोक १४-१६) २. आम्रफल में आसक्त हो राजा के द्वारा अपने जीवन सूत्रकार ने दो श्लोकों (१४-१५) में एक व्यावहारिक और राज्य को खो देना। उपमा का उल्लेख किया है। सोलहवें श्लोक में उसका निगमन दोनों कथाओं के लिए देखें इसी अध्ययन का आमुख। प्रस्तुत किया है। नेमिचन्द्र ने सरस शब्दों में उस कथा का २२. प्रज्ञावान् पुरुष की (पण्णवओ) विस्तार इस प्रकार किया हैशान्त्याचार्य के अनुसार वही व्यक्ति प्रज्ञावान कहलाता है एक धनिक बनिये के तीन पुत्र थे। उसने अपने पुत्रों की जो ज्ञान और क्रिया-दोनों से युक्त हो, जो हेय और उपादेय बुद्धि, व्यवसाय-कौशल, पुण्यशालिता और पुरुषार्थ की परीक्षा की विवेक-बुद्धि से युक्त हो। निश्चयनय के अनुसार क्रियारहित लेनी चाही। उसने एक उपाय किया। तीनों पुत्रों को एक-एक प्रज्ञा अप्रज्ञा ही होती है। हजार कार्षापण देते हुए उसने कहा-'इस पूंजी से तुम तीनों नेमिचन्द्र के अनुसार प्रकृष्ट ज्ञान प्रज्ञा है। क्रिया-विकल व्यापार करो और अमुक काल के बाद मेरे पास पूंजी लेकर ज्ञान प्रकृष्ट होता ही नहीं, क्योंकि उसमें राग-द्वेष आदि आओ।' वे तीनों मूल पूंजी को लेकर अपने नगर से चले और समन्वित रहते हैं। अतः वह अप्रज्ञा ही है।' भिन्न-भिन्न नगरों में व्यापार करने के लिए अवस्थित हो गए। २३. अनेक वर्ष नयुत (असंख्यकाल) की एक ने सोचा-'पिताजी हमारी परीक्षा करना चाहते हैं। इसीलिए (अणेगवासानउया) उन्होंने परदेश भेजा है। अब मेरा कर्त्तव्य है कि मैं प्रचुर अर्थ वर्षों के अनेक नयुत–अर्थात् पल्योपम सागरोपम । 'नयुत' का उपार्जन करूं और पिताजी को संतुष्ट करूं।' जो मनुष्य एक संख्यावाची शब्द है। वह पदार्थ की गणना में भी प्रयुक्त पुरुषार्थ नहीं करता वह केवल 'हडप्पा' जैसा होता है, केवल होता है और आयुष्य काल की गणना में भी। यहां आयुष्य काल घास-फूस का पुतला होता है। इसलिए अपना पुरुषार्थ करना की गणना की गई है। अतः इसके पीछे वर्ष शब्द जोड़ना पड़ा। अपेक्षित है। मेरे लिए अर्थ के उपार्जन का यह सुन्दर अवसर १. (क) उत्तराध्ययन चूर्णि, पृ० २६२। (ख) बृहद्वृत्ति, पत्र २७६ : 'सहस्रं' दशशतात्मक, कार्षापणानामिति गम्यते। २. Monier Monier-Williams, Sanskrit English Dictionary, p. 276. ३. हिन्दू सभ्यता, पृ० १७४, १७५। ४. बृहद्वृत्ति, पत्र २७८। ५. सुखबोधा, पत्र ११६ । ६. उत्तराध्ययन चूर्णि, पृ० १६३ : भगवता वरिससताउएस मणुएसु धम्मो पणीतो इत्यतः ऊणे वाससयाउए। ७. बृहवृत्ति, पत्र २७८ : भगवतश्च वीरस्य तीर्थे प्रायो न्यूनवर्षशतायुष एव जन्तव इतीत्थमुपन्यासः। Jain Education Intemational For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003626
Book TitleAgam 30 Mool 03 Uttaradhyayana Sutra Uttarajjhayanani Terapanth
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2006
Total Pages770
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_uttaradhyayan
File Size25 MB
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