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________________ सेणावइरयण-सेस १०८७ १०,७६ से ७८,८० से ११,१०६ से १११, १२८,१२६,१५१ से १५७,१७०,१७८,१८६, सेयणगसंठित (सेचनकसंस्थित) सु ४१३ १८८,२०६,२१०,२१६,२१६,२२१,२२२ सेयणय (सेचनक) उ १६६ से १६,१०३,१११, उ १२९२,३।११,१००।५।१० ११२ सेणावइरयण (सेना तिरल) ज ३।१७८,१८६, । सेयता (श्वेततः) सू ४।१ १८८,२०६,२१०,२१६,२२०,२२१:५।१६।। सेयबंधुजीवय (श्वेतबन्धुजीवक) । १७।१२८ सेणावइयणत (सेना तिराह) प २०१५८ सेयमाल (श्वेतमाल) ज २१८ सेणाबच्च (नैना त्य) २।३०,३१,४१,४६ सेयविया (श्वेतविका) प ११६३१६ ज१४:५; ३।१८५,२०६,२२१,५।१६ उ ॥१० सेया (श्वेततः) चं ६ सू १।६।१ सेणि (श्रेणि) अ ३१२,१३,२८,२६,४१,४२,४६, सेयाल (एष्यत्काल) प २८।२२,३४,३६,६८ ५.०,५८,५६,६६,६७,७४,७५,१४७,१४८, सेयासोय (श्वेताशोक) प १७।१२८ १६८,१६६,१७८,१८६,१८८,२०३,२१६, सेरियय (मैरे क) प ११३८।१ २१६,२२१ सेरिया (सेरिका) ज २।१०४।१६६ सेणिय (श्रेणिक) ११०,१२,२६ से ३२,३४, सेरुतालवण (सेरुतालवन) ज २६ ३६ ते ४४,४६ से ४६,५७,५८,६१,६२,६५, सेल (शल) प २१११११२५ ६६,६८,७२ से ७४,८२,८३,८६ से १२,६५, सेलसिहर (शैलशिखर) ज २।८८ ६६,१०३,१०६ से ११४,१४५; २१५,१७,२२; सेलु (शेलु) प ११३५।१ ३।४,२१,२४,८६,१५५,१६८,४।४ सेलेसि (शैलेशी) प ३६।६२ सेण्ण (मंन्य) ज ३।१५.२१,३१,३४,७७,७८,६१, सेलेसिपडिवण्णग (शैलेशीप्रतिपन्नक) प १११३६%3 ९५,१५६,१७३,१८५,१६९ २२१८ सेण्हा (श्लक्ष्णर) ११३५।३ सेल्लार (दे० कुन्तकार) प १६७ भाला बनाने सेत (श्वेत) २।४७१३,२०६४ ज ३।१२,८८ वाला सेत (थेस) १०१८४।१ सेवणा (सेवना) प १११०१।१३ सेदसप्प (स्वेतप) १७० सेवाल (शैवाल) प ११३८।२,११४६,११४८११, सेय (श्वेत) प ४६ ११६,३८,३।१८,३१, ११६२ ज २०१० ३५,६३,१८०, ४११०.८५,११५,१२१ १२५, सेवालभक्खि (शैवालभक्षिन्) उ ३१५० २१७;15.२,७।१७८ व २१म११६ सेस (शेष) प १११०१।११।२।३२,३४,३६ से ४०, उ ११४६५११६ ५१ से ५४,५८,६०,६२,३११८२,५।६४, सेय (वेद) १६१५४ १५२,१५४,२०५,२४४;६।८१,८३,८४; सेय (धयन्) ३।११३, १३८।१।७११२२११ १०।१४।६।१२।३८१३।१५ से १८:१५।१८, उ ११५१,५.४,६६,७६,७६,६६,१०७,११६; १६,३४,७५,५२,१७।२३,२५,२७,२६,३४, ३।४८,५०,५५.१०६,११८ ३५;२०१८,५६,६०; २२।४५,५५.८०; सेयंकर (भार): २०१८,२०१८१७ २३४५६,१५६,१५६,१६३,१६१,१६३,१६६; सेयंस (श्रेषस) ज ७/११४११ २४।८,६२५।४२८।२६,३८,४६,७४,१०१, सेयकणवीर (बेतकरवीर) १७१२८ १२३,१४५,३०११४:३२।६।१;३४।२२ से सेयणग (सेचनक) उ ११६६.१०२ से ११६,१२७; २४;३५।१।२;३६।३३,६७ से ६९,७१,७३ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003555
Book TitleUvangsuttani Part 05
Original Sutra AuthorN/A
AuthorTulsi Acharya, Mahapragna Acharya
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1989
Total Pages1178
LanguagePrakrit
ClassificationBook_Devnagari, Agam, & Canon
File Size22 MB
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