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________________ पुण्य-पाप की गुत्थियाँ । ५५ इस रूप में अपने शरीर को श्रम के साथ जोड़ने की महत्वपूर्ण बात आपके सामने आ रही है। जब मनुष्य धन प्राप्त कर लेता है और पूँजी का संचय कर लेता है, तो वह अपने शरीर से काम लेना भूल जाता है। वह समझने लगता है, कि वह अपना बोझा दूसरों पर लाद कर चलने के लिए है और उसके स्वयं के हाथ-पैर काम करने के लिए नहीं हैं। और इस असमीचीन विचार से प्रेरित होकर धनवान् अपने जीवन को परावलम्बी बना लेता है। वह अपने शरीर को फुलाता जाता है और उससे कुछ भी काम नहीं लेता है। इस स्थिति को लोग पुण्य की लीला समझ कर श्रम के महत्त्व को भूल जाते हैं। इस तरह जीवन को पराश्रयी बना लेने में महत्त्व समझा जाता है, बड़प्पन माना जाता है। यद्यपि धनवान् की दृष्टि में यही सही है; किन्तु वास्तव में यह दृष्टि से सही नहीं, गलत है। श्रम अपने आप में महत्त्वपूर्ण और मूल्यवान् है । उसे हम अच्छी तरह समझ नहीं पाते हैं। कभी-कभी इसके साथ पुण्य और पाप की परिभाषाएँ भी जोड़ देते हैं, और जब जोड़ देते हैं तब एक नवीन समस्या खड़ी हो जाती है । जो आदमी अपने शरीर से काम न ले और अपने हाथों-पैरों को बेकार रखे, अर्थात् खुद काम न करे और दूसरों से ही सारा काम करवाए, क्या वह भाग्यशाली है ? जो जितना काम करना छोड़ता जाए और दूसरों से कराता जाए, अर्थात् जो जितना अकर्मण्य, परावलम्बी और परमुखापेक्षी हो, उसे उतना ही पुण्यवान् समझना चाहिए ? आज से नहीं, पहले से ही भारतवर्ष के मन में, बैठ गया है कि अपने आप काम न करना पुण्य का उदय है। अपने लिए दूसरों का उपयोग करना पुण्य की निशानी बन गई है। इसलिए यह दृष्टि बन गई है कि जो बड़े हैं, वह दूसरों के सहारे चलें और जितने दूसरों के सहारे चलेंगे, वे उतने ही भाग्यशाली करार दिए जाएँगे । इस मिथ्या भ्रम के पैदा हो जाने कारण शरीर की कीमत गिर गई और साथ-साथ पाप और पुण्य की व्याख्याएँ भी उलझ गईं। जो सड़क पर से पैदल गुजर रहे हैं, वे चाहे कितनी ही धार्मिक वृत्ति के हों, उन्हें हल्का कहेंगे और पाप का उदय समझेंगे। और जो मोटर में निकलेंगे, उन्हें पुण्य का फल भोगने वाला कहेंगे। हम विचार करना चाहते हैं कि इस समझ में कहीं गलतफहमी तो नहीं आ गई है ? एक बार मैं एक पुराने संत का प्रवचन सुन रहा था, उन्होंने एक दृष्टान्त देना शुरू किया— एक राजा था। वह घोड़े पर चढ़कर सैर करने गया । किन्तु घोड़े को छोड़कर हाथी पर चढ़ गया और फिर हाथी से उतरकर पालकी में बैठ गया। बाद में पालकी को भी छोड़ दिया और एक वृक्ष के नीचे मसनद और गद्दी लगाकर लेट गया। इधरJain उधर से नौकर आकर पैर दबाने लगे। Lite & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003416
Book TitleUpasak Anand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni, Vijaymuni
PublisherSanmati Gyan Pith Agra
Publication Year1995
Total Pages222
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size10 MB
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