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________________ १७० नवस्मरणादिलकु अणहिलपुर पाटण मांहे प्रतिमा, तुरकतणें घर हुंती जी । अश्वनी भूमि अश्वनी पीडा, अश्वनी वालि विगूती जी ||गु० ||५|| जागंतो जक्ष जेहने कहियै, सुहणौ तुरकनै आपे जी । पास जिनेसर केरी प्रतिमा, सेवक तुझ संतापै जी ॥ गु०॥६॥ ग्रह ऊठीने परगट करजे, मेघा अधिको म लेजे ओछो म लेजे, टक्का पांच सै लेजे जी ॥ गु०॥७॥ नहीं आपिस तो मारिस मुरडिस, मोरबंध बंधास्ये जी । गोठीने देजे जी । पुत्र कलत्र धन हय हाथी तुझ, लच्छि घगी घर जास्ये जी ॥ गु०॥८॥ मारग पहिलो तुझने मिलस्यै, सारथवाह जे गोठी जी । निलवट टीलो चोखा चोढया, वस्तु वहै तसु पोठी जी ॥० ॥ ९ ॥३॥ ( दोहा ) मनसुं बहनो तुरकडो, माने वचन प्रमाण । बीबी ने सुहणा तणो, संभलावे सहिनाण ॥ १० ॥ बीबी बोले तुरकने, बड़ा देव है कोय | अब संताव परगट करो, नहींतर मारे सोय ॥ ११ ॥ पाछली रात परोढीयै, पहली बांधै पाज । सुहणा माहें सेठने, संभलावै ( ढाल ) एम कही यक्ष आयो राते, सारथवाहने पास तणी प्रतिमा तुं लेजे, लेतां सिर मत धूणे जी ॥ ९० ॥ १३ ॥ पांच सै टक्का तेहने आपे, अधिको म आपीस वारे जी । जक्षराज ॥ १२॥ सुहणें जी । जतन करी पहुँचाडे थानिक, प्रतिमा गुण संभारे जी || ए० ॥ १४ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003287
Book TitleNavsmaranadisangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVicharshreeji, Damayantishreeji
PublisherNagindas Kevalshi Shah Ahmedabad
Publication Year1964
Total Pages258
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size11 MB
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