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चिकित्सक के पास एक साथ दो रोगी गए। दोनों का निदान किया। एक से कहा-तुम सर्दी में मेथी के लड्डू बनाकर पौष्टिक भोजन करो। दूसरे को देखकर कहा-तुम भोजन करते हो, उसमें कमी करो। दिन में एक बार ही भोजन करो। यह एक के प्रति मोह, दूसरे के प्रति विद्रोह नहीं था। यह पक्षपात नहीं है। परन्तु दोनों के हित के लिए कहा गया था। जिसने ज्यादा खाद्य-असंयम किया था, उसे अधिक संयमित रहने को कहा गया। उसके लिए व्रतों की अधिक आवश्यकता है। जिसका मन चंचल और अस्थिर हो, व्रतों का विकास जीवन में आवश्यक है। जितना खाना-पीना उपयोगी है, उतना ही व्रत उपयोगी है, बल्कि मेरी समझ में व्रत उससे भी अधिक उपयोगी है।
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