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________________ २६ दशाश्रुतस्कन्धसूत्रम् झंझ-करे ।। १७ ।। झञ्झा-करः ।। १७ ।। पदार्थान्वयः - झंझकरे- फूट उत्पन्न करने वाले वचनों का प्रयोग करने वाला । मूलार्थ -1 - परस्पर भेदभाव उत्पन्न करने वाले वचनों का प्रयोग करने वाला । टीका- गणों में परस्पर भेद उत्पन्न करने वाले तथा उनके चित्त में दुःख पैदा करने वाले वचनों का प्रयोग असमाधि पैदा करने वाला होता है कारण स्पष्ट है- जब गण में भेद उत्पन्न हो जाएगा तो समाधि भङ्ग होकर अवश्य असमाधि की उत्पत्ति होगी जिसका परिणाम आत्म-विराधना और संयम - विराधना होगा । प्रथम दशा जब किसी व्यक्ति को दुःख होता है तो उसके चित्त में खेद तथा क्रोध के अतिरिक्त अन्य भाव प्रायः उत्पन्न नहीं होते; और ये दोनों समाधि को समूल नष्ट करने में पूर्ण समर्थ हैं; अतः सिद्ध हुआ कि भेद भाव उत्पन्न करने वाले वचनों का प्रयो न करना चाहिए । आत्म-समाधि के इच्छुक व्यक्तियों को तो ऐसे कृत्यों से सर्वथा पृथक् रहने में ही लाभ है । "झञ्झा" शब्द का असभ्यता से परस्पर विवाद करने में भी प्रयोग होता है । समाधि - इच्छुक व्यक्तियों को ऐसा विवाद कभी नहीं करना चाहिये । सार यह निकला कि परस्पर भेदोत्पादक शब्दों का कभी प्रयोग न करे, क्योंकि इससे असमाधि का प्राप्त होना अनिवार्य है । अब सूत्रकार कलह - विषय का वर्णन करते हैं: कलहइ-करे ।। १८ ।। कलह-करः ।। १८ ।। पदार्थान्वयः - कलहकरे - कलह करने वाला । मूलार्थ - कलेश करने वाला । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002908
Book TitleAgam 27 Chhed 04 Dashashrut Skandh Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAtmaram Maharaj
PublisherPadma Prakashan
Publication Year2001
Total Pages576
LanguageHindi, English
ClassificationBook_Devnagari, Book_English, Agam, Canon, Conduct, & agam_dashashrutaskandh
File Size11 MB
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