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________________ ॥ श्रीउदयप्रभदेवसूरिविरचित ॥ ॥ आरंभसिद्धि ॥ ॥ भाषान्तर ॥ ॥ अथ प्रथमो विमर्शः॥ ॥ ॐ नमः श्रीसर्वज्ञाय ॥ श्रीधर्मन्यायसम्यग्व्यवहृतियुक्तेर्जीवलोकेन जा, श्रेष्ठे तादृमुहूर्ते परिणयनमिहाचीकरद्यो युगादौ । खीखायेते ययैतौ सततमवियुतौ सत्फखान्यौ स दत्ता, वस्तुं नः सिद्धिसौधे सुसमयमृषजस्वामिदैवज्ञराजः॥ र्थ-जे शपलदेव स्वामीए युगना प्रारंजमां तेवा को श्रेष्ठ मुहूर्ते श्रीधर्म अने वक सम्यक् प्रकारनी व्यवहृति (व्यवहार )रूप युवति (स्त्री)नो जीवलोकर्ता साथे विवाह कराव्यो , ते श्रीशषनस्वामीरूपी श्रेष्ठ दैवज्ञ (नैमित्तिक) जे मा बन्ने दंपती सत फळे करीने व्याप्त एवा श्रश्ने निरंतर वियोग रहित क्रीमा नकारे सिद्धिरूपी सौधमां निवास करवा माटे अमने सारं मुहूर्त श्रापो. श्रादर्शेषु पुरापि सन्ति कतिचियाख्यालवाः केऽपि च, प्राप्ताः श्रीवरसोमसुन्दरगुरोः पादप्रसादानवाः । उक्तानुक्तरुक्कमर्थमथ तैरारंसिधेरहं, व्याकर्तुं स्वपरोपकारविधये तकार्तिकं प्रस्तुवे ॥ :-श्रा श्रारंसिधिनामना ग्रंथनी व्याख्याना केटखाक लवो (नानी व्याख्या) पण केटखांक पुस्तकोमा बे, अने केटलाक नवा खवो मने उत्तम एवा श्रीसोमगुरुना चरणकमळना प्रसादथी प्राप्त थया , माटे ते सर्व लवोए करीने पोताना रना उपकारने माटे उक्क, अनुक्त अने पुरुक्त अर्थने स्पष्ट करवा माटे हुं श्रा सधिनी व्याख्या करूं जरतक्षेत्रमा समग्र त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ श्रने काम )नुं वा प्रमाणे उर्पाजन करगर्जना करतो गुर्जर (गुजरात)नामे देश ने. तेना स्वामी श्रीवीरधवल नामना राजाए ते (संघवी ) श्रीवस्तुपाळने सर्व राज्यना व्यापारनो अधिकार प्राप्यो हतो. ते रे श्रीशचुंजय, नजायंत (गिरनार) अने शूर्बुद (बाबु) विगेरे मोटां तीर्थोमां Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002765
Book TitleArambhsiddhi Lagnashuddhi Dinshuddhi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdayprabhdevsuri, Haribhadrasuri, Ratshekharsuri
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1918
Total Pages524
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size12 MB
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