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________________ १६५ ॥आरंसिधि॥ श्रने त्यारपजी अनुक्रमे बीजां नक्षत्रो मूकवां (अन्निजित् गणवू नहीं ). तेमां पंदर नक्षत्रो नामी उपर श्रावे अने बार नक्षत्रो बहार रहे ए रीते सर्प करीने जीवित अथवा मरण स्पष्ट रीते जाणवू. जुजंगनी स्थापना. २००००90696002080006660०१२२ अहीं जे जे ग्रहो जे जे नक्षत्रोमां होय, ते ते ग्रहो ते ते नक्षत्र उपर मूकवा. पजी सूर्यना नक्षत्रयी रोगीना नामनक्षत्र सुधी गणवं. तेमां जो पहेली नामीमां एटले पहेले, नवमे, तेरमे, एकवीशमे के पचीशमे रोगीनुं नक्षत्र होय तो मरण थाय, जो बीजी नामीमां एटले बीजे, आठमे, चौदमे, वीशमे के बवीशमे रोगीनुं नक्षत्र होय तो घj कष्ट थाय, अने रोगीनुं नक्षत्र त्रीजी नामी उपर एटखे त्रीजे, सातमे, पंदरमे, उंगणी. शमे के सत्यावीशमे होय तो थोड़ें कष्ट थाय. बाकीनां बार नक्त्रो उपर रोगीनुं नक्षत्र होय तो आरोग्य आय. अहीं शुनाशुन ग्रहना वेधयी पण शुनाशुन फळ विशेष प्रकारे कहे,." । यतिवद्धनमा तो था प्रमाणे ज जुजंगचक्रने स्थापवानुं कर्तुं ने, पण तेमां श्रा नक्षत्र प्रथम मूकवानुं कहे . ते था प्रमाणे. “श्राद्यैिः पञ्चदशनिस्त्रीणि त्रीएयन्तरा त्यजन् । त्रिनामिचक्रे चन्ना १ कै २ जन्म ३ वेधे न जीवति ॥१॥" "श्रांतरे आंतरे त्रण त्रण नक्षत्रोने तजीने आओ नत्रथी पंदर नक्षत्रोने त्रिनामीना चक्रमा स्थापवां. तेमां जो चंड, सूर्य श्रने रोगीना नामना नक्षत्रनो (ए त्रणेनो) वेध थाय तो ते रोगी जीवे नहीं.” त्रिनामी चक्रनी स्थापना. आपुपुअमपू'उहविस्वाविअसे मूपू उश्रधशपूर रेअभकृण्मू व्याधि अवाने समये जो चंखें, सूर्यनुं अने रोगीनुं नक्षत्र एक नामी पर होय तो रोगीनु मरण नीपजे. दिनशुधि ग्रंथमां तो त्रण त्रण नक्षत्रनो त्याग कर्या विना ज ार्माथी आरंजीने त्रिनामी चक्रनी स्थापना तथा फळ या प्रमाणे कहे . Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002765
Book TitleArambhsiddhi Lagnashuddhi Dinshuddhi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorUdayprabhdevsuri, Haribhadrasuri, Ratshekharsuri
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year1918
Total Pages524
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Jyotish
File Size12 MB
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