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________________ -५६. १०.१५] महाकवि पुष्पदन्त विरचित जलकीलइ वणकीलइ रमंतु अंगाई कुसुमसयणइ घिवंतु । भंडारवत्थुसारई णियंतु मायंगतुरंगसमारुहंतु। घवघवघवंतु चलणेवराई माणंतु चारुअंतेउराई। आसत्तु कामि णं भमरु गंधि मुउ हुउ अंतिमणरयंतरंधि । णिवसे प्पिणु पुहईजणणिगम्भि हा हा सइंभु पडिओ सि सुन्भि । सम्मत्तवंति मिच्छत्तविरह मई भायरम्मि जिणधम्मणिरइ । बुद्धो सि ण कम्महु अस्थि मल्लु किं बद्ध आसि णियाणसल्ल । इय एव धम्मु विरएवि सोउ णंदणहु समप्पिवि सिरिविहोउ । आउच्छिवि परियणु सयेणु लोउ दुज्जोउ व मेल्लिवि दिव्वभोउ । पणवेवि विमलवाहणु जिणिंदु बहुरायहिं सहुँ हूयउ मुणिंदु । पावेप्पिणु करणविहीणणाणु भवयणि णिउंजिनि धम्मदाणु । घत्ता-भरहेसरु पढमणरेसरु जिह तिह धम्मु वि दढभर॥ गउ मोक्खहु सासयसोक्खहु पुप्फदंतगणसंथुउ ॥१०॥ इय महापुराणे तिसट्टिमहापुरिसगुणालंकारे महामवमरहाणुमण्णिए महाकइपुप्फयंतविरइए महाकम्वे धम्मसंयंभुमहुकहंतरं णाम छप्पण्णासमो परिच्छे प्रो समत्तो ॥५६॥ विश्व में लक्ष्मीको धारण करनेवाला अर्धचक्रवर्ती हो गया। जलक्रीड़ा और वनक्रीड़ामें रमण करते हुए, कुसुमोंके शयनतलोंपर अंगोंका निक्षेप करते हुए, भाण्डारकी श्रेष्ठ वस्तुएं देखते हुए, हाथियों और घोड़ोंपर चढ़ते हुए, चंचल नूपुरोंको छम-छम बजाते हुए, सुन्दर अन्तःपुरोंको मानते हुए वह काममें उसी प्रकार आसक्त हो गया मानो गन्धमें भ्रमर हो। मरकर वह अन्तिम नरकमें उत्पन्न हुआ। माता पृथ्वीके गर्भमें रहकर हाहा, स्वयम्भू श्वभ्र नरकमें गया। मेरे भाई, सम्यक्दृष्टि, मिथ्यात्वसे विरत और जिनधर्ममें निरत होते हुए भी मैंने जान लिया कि कर्मसे शक्तिशाली कोई नहीं है। उसने निदान शल्य क्यों बाँधा था? इस प्रकार धर्म बलभद्र शोक कर तथा अपने पुत्र को श्रीविभोग समर्पित कर, स्वजन और परिजनोंसे पूछकर, खोटे ग्रहोंकी तरह दिव्यभोगको छोड़कर, विमलवाहन जिनेन्द्रको प्रणाम कर अनेक राजाओंके साथ वह मुनि हो गया। और इन्द्रियोंसे विहीन ज्ञान पाकर, भव्यजनोंमें धर्मदानका प्रयोग कर पत्ता-जिस प्रकार प्रथम नरेश्वर भरतेश्वर उसी प्रकार दृढ़भुज धर्म बलभद्र भी नक्षत्रगण द्वारा संस्तुत शाश्वत सुखवाले मोक्षके लिए गया ॥१०॥ इस प्रकार प्रेसठ महापुरुषों के गुणालंकारोंसे युक्त महापुराणमें महाकवि पुष्पदन्त द्वारा रचित एवं महामव्य भरत द्वारा अनुमत महाकाव्यमें धर्म-स्वयम्भू-मधु कथान्तर नामका छप्पनवाँ परिच्छेद समाप्त हुआ ॥५६॥ ३. A°धवंतचल । ४. AP°णेउराई। ५. AP माणंतु सुहयभंते । ६. AP सयलु । ७. A भव्वयण । ८. AP णिजुजिवि । ९. A पुष्फयंत । १०. A महुमहकहंतरं । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002724
Book TitleMahapurana Part 3
Original Sutra AuthorPushpadant
AuthorP L Vaidya
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1981
Total Pages574
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Mythology, & Story
File Size12 MB
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