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________________ १२. धर्मानुप्रेक्षा ३०३ संयममेदाः साक्षान्मोक्षप्राप्तिकारणानि । सामायिक १ छेदोपस्थापना २ परिहार विशुद्धिः ३ सूक्ष्मसापरायः यथाख्यात चारित्रमिति ५। तथा च पञ्चमहाव्रतधारणपञ्चसमितिपरिपालनपयविंशतिकषायनिग्रहमायामिथ्यानिदानदण्डत्रयत्यागपञ्चेन्द्रियजयः संयमः । “वदसामेदिकसा याग दंडाण तहेदियाण पंचण्हें । धारणपालणणिग्गहनागजयो संजमो भणिओ॥" "अमहादो विणिवित्ती सुहे पवित्ती य जाण चारित । बदसमिदिगुतिजुत्तं ववहारणयादु जिणभणियं ॥” एतेषां विस्तारव्याख्या गोम्मटसारभगवत्याराधनाचारित्रसाराचारसारादिग्रन्थेषु ज्ञातव्या ॥ ३९९ ॥ अथ तपोधर्ममाचष्टे इह-पर-लोय-सुहाणं णिरवेक्खो जो करेदि सम-भावो । विविहं काय-किलेस तव-धम्मो णिम्मलो तस्स ॥४००॥ [छाया-इहपरलोकमुखानां निरपेक्षः यः करोति समभावः । विविधं का यश नपोधर्मः निर्मलः तस्य ॥] तस्य मुनेः तपोधनस्य तपोधर्मस्तपश्चरणाख्यो धर्मों भवेत् । कथंभूतस्तपोधर्मः । निर्मल: मलातीतः दोषरहितः द्वादशविधतपश्चरणा तिवाररहितः । तस्य कस्य । यो मुनिः तपोधनः कायक्लेशं विविधं करोति अनेक प्रकारम् अनेकमेदभिन्न शरीरदमनं शरीरस्पर्शनादीन्द्रियमनसा दमनं संयमनं वशीकरण विदधाति । 'अनशनावमोदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशग्न्यासनकायक्लेशा बाह्यं तपः' । 'प्रायश्चित्तविनयवैयावृत्त्यवाध्यायव्युत्सर्गध्यानान्युत्तरम्' इति द्वादशविधं तपश्चरणं करोतीत्यर्थः । कायलेशं क्षुत्पिपासाशीतोष्णदंशमशकादिपरीषहसहनं शीतोष्णवर्षाकालेषु चतुःपथगिरिशिखरापगातस्वृक्षमुलेषु योगधरणं च करोति । यः कीदृक्षः सन् तपोधनः । इहपरलोकसुखानां निरपेक्ष:, इलोकसुखाना म्बर्गमर्त्यपातालस्थितानामिन्द्रनरेन्द्रधरणेन्द्रादीनां सौख्यानां वाञ्छारहितश्च । 'निःशल्यो व्रती' इति वचनात् मायामिथ्यानिदानशल्यत्रयरहित इत्यर्थः । पुनः कीदृक्षः तपोधनः । समभावः सर्वत्र सुखदुःखशत्रुमित्रलाभालाभेष्टानिष्टतृणकाञ्चनादिषु समपरिणामः सदृशपरिणाम इत्यर्थः । तथा हि उपार्जितकर्मक्षयार्थ मार्गाविरोधेन तपखिना तप्यते इति तपः, सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूपरनअयप्रकटीकरणार्थम् इक्छानिरोधो वा तपः ॥ ४०० ॥ अथ त्यागधर्ममाचष्टे जो चयदि मिट्ठ-मोजं उवयरणं राय-दोस-संजणयं। वैसदि ममत्त हेतुं चाय-गुणो सो हवे तस्सं ॥४०१॥ शील आदिका उपदेश करनेवाले, हित मित और मधुर वचन ही बोलना चाहिये । दूसरोंकी निन्दा और अपनी प्रशंसा नहीं करना चाहिये । यह वाक्यशुद्धि है । इस प्रकार ये आठ शुद्धियाँ संयमीके लिये आवश्यक हैं । गोम्मटसारमें, पांच व्रतोंका धारण, पाँच ममितियोंका पालन, कषायोंका निग्रह, मन वचन कायकी प्रवृत्तिका त्याग और पाँचों इन्द्रियोंके जीतनेको संयम कहा है। इनका विस्तृत व्याख्यान चरणानुयोगके प्रन्योंसे जानना चाहिये ॥३९९।। आगे तपधर्मको कहते हैं। अर्थ-जो समभावी इस लोक और परलोकके सुखकी अपेक्षा न करके अनेक प्रकारका कायक्लेश करता है उसके निर्मल तपधर्म होता है । भावार्थ-भूख, प्यास, शीत, उष्ण, डांस मच्छर वगैरहकी परीषहंको सहना, तथा शीतऋतुमें खुले हुए स्थानपर, ग्रीष्मऋतुमें पर्वतके शिखरपर और वर्षाऋतुमें वृक्षके नीचे योग धारण करने को कायक्केश कहते हैं । और कायक्लेश करनेका नामही तप है । किन्तु उसी मुनिका तप निर्मल कहा जाता है जो सुख दुःखमें, शत्रु मित्रमें, लाभ अलाभमें, इष्ट अनिष्टमें और तृण कंचनमें समभाव रखता है, तथा इस लोक और परलोकके सुखोंकी जिसे चाह नहीं है । क्योंकि जो मायाचार, मिथ्यात्व और निदान ( आगामी सुखों की चाह ) से रहित होकर व्रतोंका पालन करता है वही व्रती कहलाता है । कोका क्षय करनेके उद्देश्यसे जैन मार्गके अनुकूल जो तपा जाता है वही तप तप है । इच्छाको रोकनेका नाम भी तप है ॥ ४०० ॥ अब त्याग धर्मको कहते हैं । अर्थ-जो मिष्ट भोजनको, राग १ ल ग कलेस । २ स-पुस्तके एषा गाथा गास्ति । ३ म विसयविसमत्त । ४ म सुधो (द्धो?) । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002713
Book TitleKartikeyanupreksha
Original Sutra AuthorSwami Kumar
AuthorA N Upadhye, Kailashchandra Shastri
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year2005
Total Pages594
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Religion, & Spiritual
File Size15 MB
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