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16 इन्द्रिय और इन्द्रियज्ञान : आधुनिक विज्ञान व जैनदर्शन
की दृष्टिसे
आधुनिक विज्ञान के अनुसंधान से पता चलता है कि जैनदर्शन पूर्णतः वैज्ञानिक है । जैनदर्शन के सिद्धांतों की परूपणा सर्वज्ञ तीर्थंकर परमात्मा ने की है । जैनदर्शन की मान्यता के अनुसार यह दर्शन इस ब्रह्मांड काल से अनादि-अनंत है ।' अतः उसके सिद्धांत की प्ररूपणा करने वाले तीर्थंकर भी अनंत हुए हैं और भविष्य में भी वे अनंत होंगे । सभी तीर्थकर एक समान सिद्धांत की प्ररूपणा करते हैं ।
तीर्थंकर परमात्मा की सब से अनोखी विशिष्टता यह है कि प्रव्रज्या ग्रहण करने के पश्चात् वे अपने साधना काल में पूर्णतः मौन रखते हैं । साधना पूर्ण होने के बाद केवलज्ञान स्वरूप आत्मप्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त होने के बाद ही वे उपदेश देना शुरु करते हैं ।'
उन्होंने शरीर धारण करने वाले संसारी जीवों के इन्द्रिय के आधार पर पाँच प्रकार बताये हैं । इन्द्रिय पाँच है । 1. स्पर्शनेन्द्रिय/त्वचा, 2. रसनेन्द्रिय/जीभ, 3. घ्राणेन्द्रिय/नाक, 4. चक्षुरिन्द्रिय । आँख, 5. श्रवणेन्द्रिय/कान ।'
एकेन्द्रिय जीवों को सिर्फ एक ही इन्द्रिय स्पर्शनेन्द्रिय होती है । पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु, व वनस्पति एकेन्द्रिय जीव हैं । द्वीन्द्रिय जीवों को केवल दो इन्द्रिय स्पर्शनेन्द्रिय व रसनेन्द्रिय होती है । शंख, कौडी, जोंक, कृमि, पोरा कैंचुआ आदि द्वीन्द्रिय जीव हैं । त्रीन्द्रिय जीवों को स्पर्शनेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय व घ्राणेन्द्रिय होती है । खटमल, , लीख, चींटी, दीमक, मकोडा, ढोला (पिल्लू), धान्यकीट आदि त्रीन्द्रिय जीव हैं। चतुरिन्द्रिय जीवों में उपर्युक्त तीन इन्द्रिय और चौथी चक्षुरिन्द्रिय होती है । बिच्छू, भौंरा, टिड्डी, मच्छर आदि चतुरिन्द्रिय जीव हैं । पँचेन्द्रिय जीव में पाँचवीं श्रवणेन्द्रिय भी होती है । गाय, घोडा, हाथी, सिंह, बाघ आदि पशु, मछली, मगर आदि जलचर जीव, मेंढक जैसे उभयचर जीव, तोता, मैना, कोयल, कौआ, चिडिया आदि पक्षी, सर्प, गोह, चंदनगोह आदि सरीसृप
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