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________________ Sim गीता दर्शन भाग-1 - और न मालूम क्या-क्या उस रुपए में स्वप्न उठने लगते हैं। उस ___ मयि सर्वाणिकर्माणि संन्यास्याध्यात्मचेतसा । एक पड़े हुए रुपए में हजार स्वप्न पैदा होने लगते हैं। लेकिन जिसे निराशीनिर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ।। ३०।। सम्मोहन नहीं है, उसे रुपए का ठीकरा ही दिखाई पड़ता है। इसलिए हे अर्जुन, तू अध्यात्म चेतसा हो संपूर्ण कर्मों को उपयोगिता है, वह भी दिखाई पड़ती है। लेकिन कोई सपना पैदा मुझमें समर्पण करके आशारहित एवं ममतारहित होकर नहीं होता। सम्मोहन सपने का उदभावक है। हिप्नोटाइज्ड, संतापरहित हुआ युद्ध कर। मोहग्रस्त चित्त ही कल्पनाओं में, सपनों में भटकता है, आकांक्षाओं में, महत्वाकांक्षाओं में भटकता है। __ कृष्ण कहते हैं, ज्ञानी पुरुष स्वयं भी इससे जाग जाता है और कष्ण कहते हैं, तू सब कुछ मुझमें समर्पित करके, ऐसा व्यवहार नहीं करता कि वे अज्ञानी, जो सम्मोहन में भरे जी रहे y आशा और ममता से मुक्त होकर, विगतज्वर होकर, हैं, उनके जीवन में अस्तव्यस्त होने का कारण बन जाए। इसका यह - सब तरह के बुखारों से ऊपर उठकर-बियांड मतलब नहीं है कि वह उनके सम्मोहन तोडने का प्रयास नहीं करता। फीवरिशनेस-तू कर्म कर। उनके सम्मोहन तोड़ने का प्रयास किया जा सकता है, लेकिन इसमें दो-तीन बातें समझने की हैं। एक, सब मुझमें समर्पित सम्मोहित हालत में उनके जीवन की धुरी को अस्तव्यस्त करना करके! यहां कृष्ण जब भी कहें, जब भी कहते हैं, सब मुझमें खतरे से खाली नहीं है। समर्पित करके, तो यह कृष्ण नाम के व्यक्ति के लिए कही गई बातें यह क्यों कह रहे हैं? वे यह इसलिए कह रहे हैं कि अगर तुझे नहीं हैं। जब भी कृष्ण कहते हैं, सब मुझमें समर्पित करके, तो यहां यह भी पता चल गया कि युद्ध व्यर्थ है, तो भी ये युद्ध के लिए वे मुझसे, मैं से समग्र परमात्मा का ही अर्थ लेते हैं। यहां व्यक्ति तत्पर खड़े लोगों में से किसी को भी पता नहीं है कि युद्ध व्यर्थ है। | कृष्ण से कोई प्रयोजन नहीं है। वे व्यक्ति हैं भी नहीं। क्योंकि जिसने अगर तू यहां से भागता है, तो सिर्फ कायर समझा जाएगा। अगर | भी जान लिया कि मेरे पास कोई अहंकार नहीं है, वह व्यक्ति नहीं तुझे यह भी पता चल गया कि युद्ध व्यर्थ है, तो यहां इकट्ठे हुए युद्ध | परमात्मा ही है। जिसने भी जान लिया, मैं बूंद नहीं सागर हूं, वह के लिए तैयार लोगों में से किसी को पता नहीं है कि युद्ध व्यर्थ है। | परमात्मा ही है। यहां जब कृष्ण कहते हैं, सब मुझमें समर्पित करके, तेरे भाग जाने पर भी युद्ध होगा, युद्ध नहीं रुक सकता है। अगर | | सब-कर्म भी, कर्म का फल भी, कर्म की प्रेरणा भी, कर्म का तुझे पता भी चल गया कि युद्ध व्यर्थ है और तू चला भी जाए, भाग | परिणाम भी सब, सब मुझमें समर्पित करके तू युद्ध में उतर। भी जाए, तो केवल जिस धर्म और जिस सत्य के लिए तू लड़ रहा | | कठिन है बहुत। समर्पण से ज्यादा कठिन शायद और कुछ भी नहीं था, उसकी पराजय हो सकती है। है। यह समर्पण, सरेंडर संभव हो सके, इसलिए वे दो बातें और युद्ध तो होगा ही। युद्ध नहीं रुक सकता। ये जो चारों तरफ खड़े | | कहते हैं, विगतज्वर होकर, बियांड फीवरिशनेस। हुए लोग हैं, ये पूरी तरह युद्ध से सम्मोहित होकर आकर खड़े हैं। | हम सब बुखार से भरे हैं। बहुत तरह के बुखार हैं। तरह-तरह इनको कुछ भी पता नहीं है, इनको कुछ भी बोध नहीं है। इन के बुखार हैं। क्रोध का बुखार है, काम का बुखार है, लोभ का अज्ञानियों के बीच, इन प्रकृति के गुणों से सम्मोहित पागलों के बीच | बुखार है। इनको बुखार क्यों कह रहे हैं, इनको ज्वर क्यों कहते हैं तू ऐसा व्यवहार कर, जानते हुए भी, देखते हुए भी ऐसा व्यवहार कृष्ण ? ज्वर हैं। असल में जिस चीज से भी शरीर का उत्ताप बढ़ कर कि इन सबके जीवन की व्यवस्था व्यर्थ ही अस्तव्यस्त न हो जाए, वे सभी ज्वर हैं। मेडिकली भी, चिकित्साशास्त्र के खयाल से जाए। और अकेला तू भागकर भी कुछ कर नहीं सकता है। हां, भी। क्रोध में भी शरीर का उत्ताप बढ़ जाता है। खयाल किया है इतना ही कर तू कि अगर तुझे होश आया है, तो तू इतना ही समझ आपने! क्रोध में भी आपका ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है, रक्तचाप बढ़ ले कि जिंदगी में सुख-दुख, हार-पराजय सब समान है। वह जाता है। क्रोध में हृदय तेजी से धड़कता है, श्वास जोर से चलती परमात्मा के हाथ में है। तू कर्ता नहीं है। तू बिना कर्ता हुए कर्म में है, शरीर उत्तप्त होकर गर्म हो जाता है। कभी-कभी तो क्रोध में मृत्यु उतर जा। भी घटित होती है। अगर कोई आदमी पूरी तरह क्रोधित हो जाए, | तो जलकर राख हो जा सकता है, मर ही सकता है। पूरे तो हम नहीं 412
SR No.002404
Book TitleGita Darshan Part 01
Original Sutra AuthorN/A
AuthorOsho Rajnish
PublisherRebel Publishing House Puna
Publication Year1996
Total Pages512
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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