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________________ ॥ दोहा॥ जिण तिहुं कालय सिद्धनी, पडिमा गुरण भंडार । तसु चरणे कुसुमांजलि, भविक दुरित हरनार ॥३॥ नमोहत् सिद्धाचार्योपाध्याय सर्वसाधुभ्यः । ।। ढाल । कृष्णागरु वर धूप धरीजे, सुगंध कर कुसुमांजलि दीजे । कुसुमांजलि मेलो नेमि जिणंदा, सिद्ध स्वरूपी० ॥ ३ ॥ ।। मन्त्र ।। ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वरायं जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमते जिनेन्द्राय कुसुमांजलिं यजामहे स्वाहा । ॥ गाथा । जसु परिमल बल दह दिसिं, महुकर झंकार सद्द संगीया। जिण चलणोवरि मुक्का, सुर नर कुसुमांजलि सिद्धा ॥ ४ ।। नमोर्हत् सिद्धाचार्योपाध्याय सर्वसाधुभ्यः । ।। ढाल । पास जिणेसर जग जयकारी, जल थल कूल उदक कर धारी। कुसुमांजलि मेलो पार्श्व जिनंदा, सिद्ध स्वरूपी० ।। ४ ।। ।। मन्त्र ।। ॐ ह्रीं श्रीं परम पुरुषाय परमेश्वराय जन्म जरा मृत्यु निवारणाय श्रीमते जिनेन्द्राय कुसुमांजलि यजामहे स्वाहा । ( 63 )
SR No.002288
Book TitleSiddhachakra Navpad Swarup Darshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorSushilsuri
PublisherSushilsuri Jain Gyanmandir
Publication Year1985
Total Pages510
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size8 MB
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