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________________ ३९४ सानुवाद व्यवहारभाष्य ४४७८. बितियस्स य कज्जस्सा,पढमेण पदेण सेवियं होज्जा। कल्प के २४ विधानों के साथ इन अठारह पदों का संचरण बितिए छक्के अन्भितरं तु सेसेसु वि पएसु॥ करने पर २४४१८-४३२विकल्प होते हैं। अकल्प अर्थात् दर्प ४४७९. बितियस्स य कज्जस्सा,पढमेण पदेण सेवियं होज्जा।। आदि के दस भागों में अठारह पदों का संचरण करने ततिए छक्के अभिंतरं तु पढमं भवे ठाणं। १०x१८-१८० विकल्प होते हैं। इस प्रकार सर्वसमास से यह ४४८०. बितियस्स य कज्जस्सा,पढमेण पदेण सेवियं होज्जा। संख्या होती है। ततिए छक्के अभिंतरं तु सेसेसु वि पएसु॥ ४४८७. सोऊण तस्स पडिसेवणं तु आलोयणं कमविधिं व। द्वितीय कार्य अर्थात् अकल्प का प्रथम पद-दर्प से प्रथम आगमपुरिसज्जातं, परियागबलं च खेत्तं च ।। षट्क, द्वितीय षट्क तथा तृतीय षट्क की प्रतिसेवना की, उसकी वह आगंतुक मुनि उस आलोचनाकामी की प्रतिसेवनाओं यथाक्रम आलोचना करे। तथा आलोचना की क्रमविधि को सुनकर, उसका अवधारण कर, (इसी प्रकार द्वितीय कार्य अकल्पलक्षणवाले के साथ उसका आगमज्ञान कितना है, उसका पुरुषजात अर्थात् वह प्रथम पद दर्शन आदि पदों की अठारह पदों के साथ संयोजना अष्टम आदि तप से भावित है या नहीं, उसका व्रतपर्याय और करने पर सर्वसंख्या ४३२ (१८४२४) आती है।) गृहीपर्याय कितना है, उसका बल कैसा है, वह क्षेत्र कैसा है-इन ४४८१. पढमं कज्जं नामं, निक्कारणदप्पतो पढमं पदं।। सबकी अवधारणा कर वह स्वदेश की ओर प्रस्थित हो जाता है। पढमे छक्के पढम, पाणइवाओ मुणेयव्वो॥ ४४८८. आराहेउं सव्वं, सो गंतूणं पुणो गुरुसगासं। (पूर्व श्लोकों ४४६८ आदि में प्रयुक्त शब्दों में से कुछेक की तेसि निवेदेति तधा, जधाणुपुव्विं गतं सव्वं ।। व्याख्या।) वह मुनि सभी बातों की अवधारणा कर अपने गुरु के पास प्रथम कार्य का अर्थ है-निष्कारण। प्रथम पद का अर्थ आकर जिस क्रम से धारण किया है, उसी परिपाटी से सुना देता है-दर्प। इसी प्रकार प्रथम षट्क प्राणातिपात आदि में प्रथम है। स्थान प्राणातिपात को जानना चाहिए। ४४८९. सो ववहारविहिण्णू, अणुमज्जित्ता सुतोवदेसेणं। ४४८२. एवं तु मुसावाओ, अदिन्न-मेहुण-परिग्गहे चेव। सीसस्स देति आणं, तस्स इमं देहि पच्छित्तं ।। बिति छक्के पुढवादी, तति छक्के होयऽकप्पादी। वह व्यवहारविधिज्ञ आलोचनाचार्य पौर्वापर्य आलोचना से इसी प्रकार मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन और परिग्रह तथा अनुमान कर श्रुतोपदेश के अनुसार प्रायश्चित्त का निर्धारण कर रात्रीभोजन-ये प्रथम षट्क के दूसरे आदि छह स्थान हैं। द्वितीय पूर्व प्रेषित शिष्य को आज्ञा देते हैं कि वत्स! तुम जाओ और षट्क में छह कायों का और तृतीय षट्क में अकल्प आदि का उनको यह प्रायश्चित्त दो। समावेश होता है। ४४९०. पढमस्स य कज्जस्सा, दसविहमालोयणं निसामेत्ता। ४४८३. निक्कारणदप्पेणं, अट्ठारसचारियाइ एताई। नक्खत्ते भे पीला, सुक्के मासं तवं कुणसु॥ एवमकप्पादीसु वि, एक्केक्के होति अट्ठरस।। प्रथम दर्पलक्षण वाले कार्य संबंधी दशविध आलोचना को निष्कारण दर्प लक्षणवाले कार्य के साथ 'दर्प' से इन सुनकर निर्धारण करते हैं कि यह आलोचना नक्षत्र अर्थात् मास अठारह पदों का योग किया गया है। इसी प्रकार अकल्प आदि प्रायश्चित्त विषय वाली है। तीनों षट्कों की पीड़ा संबंधी प्रत्येक के साथ ये अठारह पद होते हैं। प्रायश्चित्त है शुक्ल अर्थात् उद्घात मास की तपस्या करना। ४४८४. बितियं कज्जं कारण, पढमपदं तत्थ दंसणनिमित्तं । ४४९१. पढमस्स य कज्जस्सा, दसविहमालोयणं निसामेत्ता। पढम छक्क वयाई, तत्थ वि पढमं तु पाणवहो।। नक्खत्ते भे पीला, चउमासतवं कुणसु सुक्के। दूसरा कार्य अर्थात् करण-कल्प है। प्रथम पद है दर्शन। ४४९२. पढमस्स य कज्जस्सा, दसविहमालोयणं निसामेत्ता। प्रथम षट्क में हैं व्रत। उनमें प्रथम है प्राणवध । नक्खत्ते भे पीला, छम्मासतवं कुणसु सुक्के॥ ४४८५. दंसणमणुमुयंतेण, पुव्वकमेणं तु चारणीयाई। प्रथम कार्य की दशविध आलोचना को सुनकर प्रायश्चित्त ___ अट्ठारसठाणाई, एवं नाणादि एक्केक्के॥ स्वरूप कहे-तुम्हें नक्खत्त अर्थात् मास का प्रायश्चित्त है। तीनों दर्शनपद को न छोड़ते हुए पूर्वक्रम के अनुसार अठारह षट्कों में पीड़ा हुई हो तो शुक्ल अर्थात् चार मास का तप, अथवा स्थानों को संचारित करना चाहिए। इसी प्रकार ज्ञान आदि छह मास का तप करे। प्रत्येक पद के साथ इन अठारह स्थानों का संचरण होता है। ४४९३. एवं ता उग्याए, अणुपाते तणि चेव किण्हम्मि। ४४८६. चउवीसऽट्ठारसगा, एवं एते हवंति कप्पम्मि। मासे चउमास-छमासियाणि छेदं अतो वुच्छं। दस होंति अकप्पम्मी, सव्वसमासेण मुण संखं। इस प्रकार उद्घात और अनुद्घात प्रायश्चित्त जो www.jainelibrary.org Jain Education International For Private & Personal Use Only
SR No.001944
Book TitleSanuwad Vyavharbhasya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDulahrajmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2004
Total Pages492
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Ethics, G000, & G005
File Size14 MB
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