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________________ १२० अनुक्रम से ध्रुव और अध्रुव है । I उत्कृष्ट, अनुत्कृष्ट और जघन्य रूप शेष तीन विकल्प सादि और सांत है । वे इस प्रकार -- जो उत्कृष्ट स्थितिबंध करते हैं वही उत्कृष्ट स्थिति संक्रमित करते हैं । उत्कृष्ट स्थितिबंध उत्कृष्ट संक्लेश से होता है और वह उत्कृष्ट संक्लेश सदैव होता नहीं, किन्तु बीच-बीच में हो जाता है, जिससे जब उत्कृष्ट स्थितिबंध हो तब उत्कृष्ट स्थितिसंक्रम होता है। इसके सिवाय शेष काल में अनुत्कृष्ट स्थितिसंक्रम होता है । इस प्रकार दोनों एक के बाद एक इस क्रम से होने के कारण सादिसांत हैं तथा जघन्य स्थितिसंक्रम एक समय प्रमाण होता है, इसलिये वह सादि-सांत है । इसको पूर्व में कहा जा चुका है । पंचसंग्रह : ७ इस प्रकार मूल कर्मों के उत्कृष्ट आदि स्थितिसंक्रम में साद्यादि भंग जानना चाहिये । सुगमता से बोध करने के लिये जिसका प्रारूप पृष्ठ १२१ पर देखिए । अब उत्तरप्रकृतियों के सादि आदि भंगों का विचार करते हैं । उत्तर प्रकृतियों के सादि आदि भंग तिविहो ध्रुवसंताणं चउव्विहो तह चरित्तमोहीणं । अजहन्नो सेसासु दुविहो सेसा वि दुविगप्पा ॥५१॥ 1 शब्दार्थ - तिविहो— तीन प्रकार का ध्रुवसंताणं— ध्रुवसत्ताका प्रकृतियों का, चउब्विहो - चार प्रकार का, तह — तथा, चरितमोहीणं - चारित्रमोहनीय प्रकृतियों का अजहतो - अजघन्य, सेसासु–शेष प्रकृतियों का, दुविहो-दो प्रकार का सेसा - शेष विकल्प, वि― भी, बुविगप्पा - दो प्रकार के । गाथार्थ - ध्रुवसत्ताका प्रकृतियों का अजघन्य स्थितिसंक्रम तीन प्रकार का है, चारित्रमोहनीय का चार प्रकार का और शेष For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International
SR No.001904
Book TitlePanchsangraha Part 07
Original Sutra AuthorChandrashi Mahattar
AuthorDevkumar Jain Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year1985
Total Pages398
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Karma
File Size18 MB
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