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________________ वसुनन्दि-श्रावकाचार ४६९ मालइ-कयंब-कणयारि-चंपयासोय-बउल-तिल एहि । मंदार-णायचंपय-पउमुप्पल-सिंदुवारेहि ॥४३१ कणवीर-मल्लियाहिं' कचणार-मचकुद-किं कराएहिं । सुरवणज जूहिया-पारिजातय -जासवण-टगरेहि ॥४३२ सोवण्ण-रुप्पि-मे हिय मुत्तादामेहि बहुवियप्पे ह । जिणपय-पंकयजयलं पुजिजज्ज सुरिदसयमहियं ।। दहि-दुद्ध-सप्पिमिस्सेहि कलमभत्तहिं बहुप्पयारेहिं । तेवट्ठि विजर्णोहिं य बहुविहपक्कण्णभएहि।।४३४ रुप्पय-सुवण्ण-कंसाइथालिणिहिएहि विविहमवर्खहि । पुज्ज वित्थारिज्जो भत्त ए जिणिदपयपुरओ। दीहि णियपहोहामियक तेएहि धूमर हिएहि । मंद चलमंदाणिलवसेण णच्चंत अच्चीहि ।।४२६ घणपडलकम्मणिवहव्व दूर मबसारियंधयारेहिं । जिणचरणकमलपुरओ कुणिज्ज रयणं सुभत्तीए। कालायरु-णह चंदह-कप्पूर सल्हारसाइदव्वेहि । णिप्पणधमवत्तोहि परिमलाय'त्तियालीहि ॥४३८ उग्गसिहादेसियसग्ग-मोक्खमम्गेहि बहलधूमेहिं । धूविज्ज जिणिदपयारविंदजुयलं सुरिंदणुयं ॥४३९ जंबीर-मोच-दाडिम-कवित्थ -पणस-णालिएरेहिं । हिताल-ताल-खज्जूर-णिबु-नारंग चारहि ।।४४० यगलको पूजे ।।४२९-४३०।। मालती, कदम्ब, कर्णकार (कनर), चंपक, अशोक, बकुल, तिलका मन्दार, नागचम्पक, पद्म (लाल कमल), उत्पल (नीलकमल), सिंदुवार (वक्षविशेष य, निर्गुण्डी), कर्णवोर (कर्नेर), मल्लिका, कचनार, मचकुन्द, किरात (अश कवृक्ष), देवोंके नन्दनवनमें उत्पन्न होनेवाले कल्पवृक्ष, जुही पारिजातक, जपाकुसुम, और तगर (आदि उत्तम वृक्षोंसे उत्पन्न) पुष्पोंसे, तथा सुवर्ण, चाँदीसे निर्मित फूलोंसे और नाना प्रकारके मुक्ताफलोंकी मालाओंके द्वारा,सौ जाति के इन्द्रोंसे पूजित जिनेन्द्र के पद-पंकज-युगलको पूजे ।।४३१-४३३।। चाँदी, सोना, और काँसे आदिकी थालियोंमें रखे हुए दही, दूध और धीसे मिले हुए नाना प्रकारके चाँवलोंके भातसे, तिरेसठ प्रकारके व्यंजनोंसे, तथा नाना प्रकारको जातिवाले पकवानोंसे और विविध भश्य पदार्थों से भक्तिके साथ जिनेन्द्र-चरणोंके सामने पूजाको विस्तारे अर्थात नैवेद्यसे पूजन करे । ४३४-४३५।। अपने प्रभासमूहसे अमित (अगणित ) सूर्योके समान तेजवाले, अथवा अपने प्रभापूञ्जसे सूर्यके तेजको भी तिरस्कृत या निराकृत करनेवाले, धूम-रहित, तथा धीरे-धीरे चलती हुई मन्द वा के वशसे नाचती हई शिखाओंवाले, और मेघ-पटलरूप कर्मसमहके समान या है अंधकारको जिन्होंने, ऐसे दीपकोंसे परमभक्तिके साथ जिन-चरण-कमलोंके आगे पूजनकी रचना करे, अर्थात् दोपसे पूजन करे ।।४३६-४३७ । कालागुरु, अम्बर, चन्द्रक, कपूर, शिलारस ( शिलाजीत) आदि सुगंधित द्रव्योंसे बनो हुई, जिसकी सुगन्धसे लुब्ध होकर भ्रमर आ रहे हैं, तथा जिसकी ऊँची शिखा मानों स्वर्ग और मोक्षका मार्ग ही दिखा रही हैं, और जिसमें ने बहुत-सा धुआँ निकल रहा हैं, ऐसी धूपकी बत्तियोंसे देवेन्द्रोंसे पूजित श्रीजिनेन्द्रके पादारविन्दयु.लको धूपित करे, अर्थात् उक्त प्रकारकी धूपमे पूजन करे ।।४३८-४३९।। जबीर (नीबू विशेष!, मोच (केला), दाडिम (अनार), कवित्थ (कवीट या कथा). पनस, नारियल, हिताल, ताल, खजूर, निम्बु, नारंगी, अचार (चिरौंजी), पूगीफल (सुपारी), १ध. प. मल्लिया । २ झ. ब. ध. प. सुरपुण्ण । ३ ध. प. पारियाय । ४ ब. सेहिय (निवत्त इत्यर्थः) । ५ निराकृत इत्यर्थः । ६ प. ब ध. मुबसा. । ७ झ. ब, तुरुक्क । ८ झ. ब. दिवेहिं । ९ प. वत्ताहिं । १० इ पंति., झ. यट्टि., ब. यड्ढि । ११ ब. कपिह। १२ झ. वारेहि। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001551
Book TitleShravakachar Sangraha Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHiralal Shastri
PublisherJain Sanskruti Samrakshak Sangh Solapur
Publication Year1988
Total Pages526
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Ethics
File Size14 MB
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