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________________ T गो० कर्मकाण्डे तत्प्रथमसमयदोळु द्वाविंशतिप्रकृतिबंधकनप्पुरिदमनंतानुबंधियुमनल्लि एकसमयप्रबद्धमं कटुगुमंतु कट्टिद समयप्रबद्धक्कुदोरणेयं माळ्पडमोदचलावळि पयंतमाबाधकालमप्पुदरिनुदयावलियोळिक्कल्बारददु कारणमचलावलिकालपथ्यंतमनंतानुबंधिरहितमिथ्यादृष्टियेंदु पेळल्पट्टना मिथ्यादृष्टिगे वेदककालमं कळिदुपशमकालदोळल्लदे सम्यक्त्वप्रकृतियुमं सम्यग्मिथ्यात्वप्रकृतियु५ मनुद्वेल्लनमं माडल्बारदरिवं सप्तविंशति षड्विंशतिस्थानद्वयसत्वं संभविसदप्पुरिदं। एकविंशति प्रकृतिबंध सासादननोळयक्कुमा सासादन- चतुर्गतिजनक्कुमा जीवक्केकजीवापेक्षयि नवाद्य दयत्रिस्थानंगळोळन्यतरस्थानोदयमक्कुं । नानाजीवापेयिद युगपत्रिस्थानोदयमक्कुमा सासादनंगष्टाविंशतिस्थानमो दे सत्त्वमक्कुमे दोडा सासादनं मुन्नं सादिमिथ्यादृष्टियादोडमनादिमिथ्या दृष्टियावोडं करणत्रयपरिणामदिदं दर्शनमोहनीयमनुपशमिसियसंयतादिचतुग्गुणस्थानमं यथा१. योग्यमं पोहि तत्सम्यक्त्वकालदोळ मिथ्यात्वप्रकृतियत्तणिदं गुणसंक्रमविधानदिदं मिश्रसम्यक्त्व. प्रकृतिगळनुपाजिसि तत्सम्यक्त्वकालमावलिषट्कमवशिष्टमादागळा कालप्रथमसमयं मोदल्गोंडु पडावलिचरमसमयपय्यंतमल्लियादोडमनंतानुबंधिकषायोदयदिदं सासादननक्कुमप्पुरिदं सम्यक्त्व. प्रकृत्युद्वेल्लितसप्तविंशतिसत्त्वमुं मिश्रप्रकृत्युद्वेल्लितषड्विंशतिसत्त्वम् संभविसवु । चतुविशति सत्त्वस्थान, संभविसदेके दोडनंतानुबंधिविसंयोजकरु असंयतादिचतुर्गुणस्थानत्तिगळु नियम१५ दिवं वेदकसम्यग्दृष्टिगळेयप्पुरिदमवरोळत्तलानुं मिथ्यात्वकर्ममुदयिसि मिथ्यादृष्टिगळेयप्परप्पु दृष्टित्वं गतः तत्प्रथमसमये द्वाविंशतिकबन्धे बद्धानन्तानुबन्ध्येकसमयप्रबद्धस्य तदुदीरणाया अचलावलिकालमसम्भवात्तदुदयरहितस्य तस्य सम्यक्त्वमिश्रप्रकृतिवेदककालत्वादुपशमकालाभावात्सम्यक्त्वमिश्रप्रकृत्यनुद्वेल्लनात् । चतुर्गतिसासादनकविंशतिकबन्धे एकजीवापेक्षया क्रमेण नानाजीवापेक्षया युगपदुदयन्नवकादिश्युदयस्थानेषु सत्त्वमष्टाविंशतिकमेव न सप्तविंशतिकषड्विंशतिके । कुतः ? उपशमसम्यक्त्वादेव सासादने गमना२० त्तत्स्थितेश्चैकसमयात्षडावलिपर्यतसमयोत्तरकालविकल्पात्मकत्वात्सम्यक्त्व मिश्रप्रकृत्युद्वेल्लनावसरस्योपशम काल स्यानवतारात् । नापि चतुविशतिकं, अनन्तानुबन्धिविसंयोजकानां नियमेन वेदकसम्यग्दृष्टित्वात्सासादने नागम दृष्टि होकर वहां प्रथम समयमें बाईसका बन्ध किया। उसमें बाँधी गयी अनन्तानुबन्धीके एक समयप्रबद्धकी उदीरणा अचलावली काल पर्यन्त तो सम्भव नहीं है। और अनन्तानु बन्धीके उदयरहित उस जीवके सम्यक्त्व मोहनीय और मिश्रमोहनीयका वेदककाल है, २५ उपशम काल नहीं है। इससे उसके सम्यक्त्व मोहनीय और मिश्रमोहनीयकी उद्वेलना नहीं होती। पूर्व में वेदककाल और उपशमकालका लक्षण कह आये हैं और वेदककाल में इनकी उद्वेलनाका अभाव भी कह आये हैं। चारों गतिके सासादनमें इक्कीसका बन्ध है। उसमें एक जीवकी अपेक्षा क्रमसे और नाना जीवोंकी अपेक्षा युगपत् नौ आदि तीन उदयस्थान हैं। उनमें अठाईसका ही सत्त्व है, ३० सत्ताईस या छब्बीसका नहीं है क्योंकि उपशम सम्यक्त्वसे भ्रष्ट होकर सासादन होता है। उसकी स्थिति एक समयसे लगाकर एक-एक समय बढ़ते हुए छह आवली पर्यन्त होती है। और सम्यक्त्व मोहनीय मिश्रमोहनीयकी उद्वेलना उपशमकालमें ही होती है वह यहाँ सम्भव नहीं है। तथा यहाँ चौबीसका भी सत्त्व सम्भव नहीं है; क्योंकि अनन्तानुबन्धीका Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001326
Book TitleGommatasara Karma kanad Part 2
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, A N Upadhye, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages828
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Principle, & Karma
File Size18 MB
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