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________________ कर्णाटवृत्ति जीवतत्त्वप्रदीपिका ४८७ . . शरीरमुब स्थावरचतुष्टयमं आनुपूर्व्यचतुष्क मुमितु पदिमूरुं प्रकृतिगलं कळेदोडे नूरो भत्त प्रकृतिगळुदययोग्यंगलप्पु १०९ वल्लि मिथ्यादृष्टियोळु मिथ्यात्वप्रकृतियों देयुदयव्युच्छित्तियक्कं १। सासादनोळु अनंतानुबंधिचतुष्टयमुदयव्युच्छित्तियक्कुं ४ । मिश्रनो मिश्रप्रकृतिगुदयव्युच्छित्तियक्कुं १। असंयतनोळु भाषापर्याप्तियिदं मेलणयोगंगळप्पुरिदं नाल्कुमानुपूण्व्यंगळं कळेदु शेष पदिमूरुं प्रकृतिगळगुदयव्युच्छित्तियक्कुं १३। देशसंयतनोळु तृतीयकषायचतुष्कर्मु तिर्यगा- ५ युष्यमुं उद्योतनाममुं नोचैर्गोत्रमुं तिर्यग्गतिनाममुमितेष्टुं प्रकृतिगळगुदद्यव्युच्छित्तियककुं ८। प्रमत्तगुणस्थानं मोदलागि सयोगिकेवलिभट्टारकगुणस्थानपयंतं पंच य चउरं छक्क छच्चेव इगि दुग सोळस तोसमें दितुदयव्युच्छित्तिगठप्पुवयोगिकेवलिगुणस्थानदोळु योगमिल्लप्पुरिदमल्लिय पन्नेरडं प्रकृतिगळ्ग सयोगिकेवलिगुणस्थानदोळुदयव्युच्छित्तियक्कुमदु कारणमागि सयोगकेवळि. गुणस्थानवोदयब्युच्छित्तिगळु नाल्वत्तरडुप्रकृतिगळप्पुवु ४२। अंतागुत्तं विरलु मिथ्यादृष्टि- १० गुणस्थानदोळु मिश्रप्रकृतियु सम्यक्त्वप्रकृतियुं तीर्थमुमाहारकद्वयमुमितन्दु प्रकृतिगळ्गनुदयमक्कुं ५ । उदयंगळु नूर नाल्कु १०४ ॥ सासादनगुणस्थानदोको दुगुडियनुदयंगळु आरु ६। उदयंगळु नूर मूरु १०३। मिश्रगुणस्थानदोळु नाल्कु गूडियनुदयंगळु हत्तरोळु मिश्रप्रकृतियं कळेदुदयंगलोलु कूडुत्तं विरलनुदयंगळो भत्तु९ उदयंगळु नूरु १००। असंयतगुणस्थानदोळो दुगूडियनुदयंगळु हत्तरोळु सम्यक्त्वप्रकृतियं कळेदुदर्यगळोळु कूडुतं विरलनुदयंगळों भत्तु ९ । उदयंगळु नूरु १०० ॥ देश- १५ संयतगुणस्थानदोळु पदिमूरुगूडियनुदयंगळिप्पत्तरंडु २२ । उदयंगळे भत्तेलु ८७। प्रमत्तगुणस्थानसूक्ष्मपर्याप्तसाधारणचतुरानुपूाणि उदययोग्यानि नेति नवोत्तरशतं ॥ १०९ ॥ तत्र मिथ्यादृष्टौ मिथ्यात्वं व्युच्छित्तिः । सासादने अनंतानुबंधिचतुष्कं ४ । मिश्रे मिश्रं १। असंयते भाषापर्याप्तेम्परि योग्यसंभवात् आनुपूर्व्यचतुष्कं विना त्रयोदश १३ । देशसंयते तृतीयकषाय चतुष्क तिर्यगायुरुद्योतनोचैर्गोत्रतिर्यग्गतयोष्टौ ८ । प्रमत्तादिसयोगपयंतं पंचयचउरछक्कछच्चेव इगिद्गसोलसतीसमिति । अयोगे योगाभावात् तद्द्वादशानां सयोगे २० एव व्युच्छित्तचित्वारिंशत् । ४२ । तथासति मिथ्यादृष्टी मिश्रसम्यक्त्वतीर्थाहारकद्वयमनुदयः ५। उदयः चतुरुत्तरशतं १०४ । सासादने एकसंयोगादनुदयः षट् ६ उदयः ञ्युत्तरशतं १०३ । मिश्रेऽनुदयः चतुष्कं गुणस्थानकी तरह एक सौ बाईसमें-से आतप, एकेन्द्रिय, विकलत्रय, स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण और चार आनुपूर्वी इन तेरह के उदय बिना उदययोग्य एक सौ नौ १०९ । मिथ्यादृष्टिमें मिथ्यात्वकी व्युच्छित्ति होती है। सासादनमें अनन्तानुबन्धी चार । मिश्रमें २५ मिश्र । असंयतमें चार आनुपूर्वीके बिना तेरह, क्योंकि आनुपूर्वीका उदय तो नवीन भवको गमन करते समय होता है और मनोयोग वचनयोग अपनी पर्याप्ति पूर्ण होनेके पश्चात होते हैं। इससे यहाँ आनुपूर्वीका उदय नहीं कहा। देससंयतमें तीसरी प्रत्याख्यानावरण कषाय चार तिर्यंचायु उद्योत नीचगोच और तियंचगति ये आठ ८। प्रमत्तसे सयोगीपर्यन्त क्रमसे पाँच, चार, छह, छह, एक, दो, सोलह । अयोगकेवलीमें योगका अभाव ३० होनेसे उसमें व्युच्छिन्न होनेवाली बारह प्रकृतियोंकी व्युच्छित्ति सयोगकेवलीमें ही होनेसे सयोगीमें बयालीसकी व्युच्छित्ति जानना। ऐसा होनेपर मिथ्यादृष्टि में मिश्र, सम्यक्त्व, तीर्थकर, आहारकद्वय पाँचका अनुदय । उदय एक सौ चार १०४ । सासादनमें एक मिलनेसे अनुदय छह । उदय एक सौ तीन १०३ । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.001325
Book TitleGommatasara Karma kanad Part 1
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, A N Upadhye, Kailashchandra Shastri
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year1999
Total Pages698
LanguageHindi, Prakrit, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Principle, Karma, P000, & P040
File Size16 MB
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