Book Title: Ketlak Madhyakalin Shabdo
Author(s): Jayant Kothari
Publisher: ZZ_Anusandhan
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Page #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ केटलाक मध्यकालीन शब्दो जयंत कोटारी अधिवासियां तरुणप्रभसूरिकृत 'षडावश्यक बालावबोध' (संपा. प्रबोध पंडित) मां अधिवासियां शब्द वपरायो छे ने संपादके एनुं मूळ सं. अधिवासित दर्शावी 'worshipped by means of perfumes' (धूप आपी पूज्या ) एवो आप्यो छे. संस्कृत अधिवासितनो 'धूप आपी सुवासित करेलुं एवो एक अर्थ छेज, परंतु 'षडावश्यक बालावबोध' मां आ शब्द जे संदर्भमां वपरायो छे त्यां ते अर्थ बंधबेसतो नथी. आ कृतिमां राजा अपुत्र मरण पामतां राज्यना प्रधान पुरुषे राजानी शोध माटे पांच "दिव्य अधिवासियां" एम कहेवामां आव्युं छे. दिव्य एटले परीक्षा अर्थेना चमत्कारो राजा तरीके जेनी पछी बरणी थाय छे ते विद्यापति पासे आवतां घोडो बारव करे छे वगेरे घटनाओ आ पछी निरूपाई छे. देखीती रीते ज अहीं अधिवासियांना 'सुगंधित कर्या' एवा अर्थने अवकाश नथी. प्राकृत कोश अहिवासिअ ( अधिवासित) शब्द सज्ज करेलुं, तैयार करेलुं' एवो आपे छे ते ज अहीं अभिप्रेत जणाय छे : पांच दिव्य तैयार कर्यांी, नक्की कर्यं. अनिवड 'आरामशोभा रासमाळा (संपा. जयंत कोठारी ) मां अनिवड शब्द आ प्रमाणे चपरायेलो मळे छे : मत द्यउ कोइ पासि अनिवड आइवा रे संपादके सं. अनिवर्तमांथी व्युत्पत्ति सूचवी अनिवडनो अर्थ 'साव ? एकदम ?' एम नोध्यो छे. देखीती रीते ज, संदर्भमां कईक बेसी शके तेवा अर्थनो तर्क करवामां आव्यो छे. मूळ तरीके दर्शावल सं. अनिवर्त आवो अर्थ भाग्ये ज आपी शके. 'जिनराजसूरि-कृति-कुसुमांजलि' (संपा. अगरचंद नाहटा ) मां अनिवड शब्द अनेक वार वपरायो मळे छे. जेमके, (१) अनिवड थातां वार न लागइ जे सगा. (२) न कहइ फेरि वचन जउ किसा, तई अनिवड जाणी तो दिसा दीसउ वड वयरागि जिसा, ए वइराग कहउ किण मिसा. (३) पलकमांहि अनिवड हुअउ रे, तिण तुझनइ साबासि रे. (४) सीख करै वाटै मिल्या रे, वीछडवानी बार, ते तो अह्म सुं सीख न का करी रे, अनवड जेम विचार. [33] Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ संपादके अनिवड शब्द शब्दकोशमां नोध्यो छे, पण एनो अर्थ आप्यो नथी. 'जिनराजसूरि-कृति-कुसुमांजलि'मां निवड शब्द पण वपरायो छ : (१) वात कहइ जे पापनी, तिण साथइ हो करुं निवड सनेह (२) बगसि गुनह ए बापजी, हिव मो सुं हो धरि निवड सनेह. (३) जेह सुं निवड सनेह ते तउ वीसार्या नवि वीसरइ. एम लागे छे के निवडना प्रयोगो ज चावीरूप बने तेवा छे. बधे निवड 'स्नेह'नुं विशेषण छ. त्रीजु द्दष्टांत गाढ, ऊंडो' एवो अर्थ स्पष्ट रीते आपे छे, “जेना प्रत्ये गाढ/ऊंडो स्नेह होय ते विसार्या वीसरता नथी." बहेला बे दृष्टांतोमां पण ए अर्थ निर्विघ्ने लई शकाय छे. ए बन्ने पंक्तिओ प्रभुप्रार्थनाना पदमांथी छे. पहली पंक्तिमा पोते पाप साथे ऊंडो स्नेह को हतो तेनो उल्लेख छे, बीजी पंक्तिमां तीर्थंकरदेवनो ऊंडो स्नेह प्राो छे. निवड शब्द निकटमाथी आव्यो होवानो तर्क थई शके. प्राकृत कोश णिअड (निकट) शब्द पासे, पासेन' एवा अर्थमां नोंधे छे. जो आ बराबर होय तो निवड एटले 'निकटनो, आलीय, गाढ' एवो अर्थ लेवानुं खोटुं न कहेवाय. अने अनिवडनो 'दूरनु, अनात्पीय' एवो अर्थ थाय, ए नोंधपात्र छे के निवडनी पेठे अनिवड स्नेहना विशेषण तरीके क्यांय वपरायेलो नथी. ए एकलो ज वपरायो छे. एथी एमां 'अनात्मीय' उपरांत 'पराया' 'निःस्नेही' एवा अर्धने प्रण अवकाश जणाय छे. जेमके, (१) जे सगा छे तेमने अनात्मीय पराया थतां वार लागती नथी. (३) पलकमां अनात्मीय परायो निःस्नेही थई गयो छे ते माटे तने शाबाशी घटे छे. .(माता दीक्षा लेवा तैयार थवेल पुत्र प्रत्येर्नु आ व्यंगवचन छे.) (४) जुदा थवाने प्रसंगे रस्ते मळी गयेला लोको पण विदाय मागे छ।रजा मागे छे तो अगारी केम विदाय रजा न मागी अने आम पराया निःस्नेहीनी जेम विचार कर्यो ? बीजा उदाहरणनां अन्धयो बराबर स्पष्ट थता नथी, पण एमां अनिवडनो आवो ज अर्थ लेवानो रहे. अनुभाव 'गुर्जररासावली' (संपा. ब. क. ठाकोर वगेरे)मां अनुभाव शब्द आ प्रमाणे वपरायो है : वाजइ तूर अनाहत, नाह तणइ अनुभावि, आणइ एक अनेकप, एक पलाणई वाहु. संपाद कोए अनुभाविनो 'by the dignity. by the authority' (गौरवथी, अधिकारथी [343 . Page #3 -------------------------------------------------------------------------- ________________ सत्ताथी) एवो अर्थ आप्यो छे. प्रसंग नेमिनाथना वरघोडानो छे. एमां 'अधिकार के सत्ता'नो अर्थ प्रस्तुत जणातो नथी, केमके नेमिनाथ राजवी नथी, राजकुमार छे. एना करतां 'गौरव, महिमा' एवो अर्थ वधु प्रस्तुत बने तेवो छे. त्यां पण 'गौरवथी' नहीं पण 'गौरव अर्थे' एम अन्वय वधु उचित लागे छे : 'नाथना गौरव के महिमाने अर्थे शरणाई वागे छे' वगेरे. ज्ञानविमलसूरिकृत 'आनंदघन बावीसी पर बालावबोध' (संपा. कुमारपाल देसाई)मां पण अनुभाव शब्द मळे छे : भवोभवथी अभिनव ए द्रव्यथी अनुभावथी ते कहीइ छई. संपादके अनुभावनो 'कर्मनो विपाक' एवो अर्थ आप्यो छे, पण अहीं पाठनुं वाचन ज दोषयुक्त होय एवं लागे छे. स्तवननी जे पंक्तिनी समजूती तरीके आ वाक्य आवे छे ते पंक्ति आ प्रमाणे छे : भविभवि रे द्रव्य भावथी भाखीइ रे. जोई शकाय छे के मूळमां अनुभाव नथी, द्रव्य अने भाब छे, एटले विवरणना अनुभाव शब्दने अनु भाव तरीके वांचवी जोईए. अनु एटले 'अने' अनु आ अर्थमां मध्यकालीन साहित्यमां बारंबार वपरायो छे. जेमके, 'गुर्जररासावली'मां ( १ ) पणमीउ सामीउ नेमिनाहु अनु अंबिकि माडी (२) सवे सलक्खण रूयवंत अनु कंचणवन्नि (३) सीसि चमर बंबाल अनु कंठि कुसुमह माल. - अप्रमाण "गुर्जररासावली'मां आ शब्द आ रीते वपरायेलो मळे छे : तिणि खिण मेल्हिउं वणचरि बाणुं, ऊडिउं गयणि हूउं अप्रमाणु. संपादकोए अप्रमाणनो अर्थ 'unknowable, invisible' (अज्ञेय, अदृश्य) एवो आप्यो छे. बाण आकाशमां गयुं तेथी अदृश्य थई गयुं एम तेमणे घटाव्युं लागे छे. पण अप्रमाणनो आवो अर्थ लेवा माटे कोई आधार जणातो नथी. अप्रमाण एटले 'असिद्ध', अहीं 'निष्फळ, नकामु': 'ते क्षणे वनचरे बाण छोड्युं. ते आकाशमां गयुं ने तेथी निष्फळ नीवड्युं.' 'आरामशोभा रासमाळा' मां पण आ शब्द वपरायेलो मळे छे : वहिली नावि तु तुं जाणि, मइ तुझ दीठउ अप्रमाण. संपाद के अप्रमाणनो 'असिद्ध' एवो अर्थ आप्यो छे. अहीं 'असिद्ध' एटले 'अशक्य, असंभवित' : 'बहेली न आवे तो तने हुं जोई शकुं ते तुं अशक्य / असंभवित जाणजे ( एटले के हुं - तुं मळी शकीशुं नहीं). ' [35] Page #4 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अबाह 'गुर्जररासावली'मां अबाह शब्द आ प्रमाणे वपरायेलो छ : तापिइं पीडिउ विलवइ अबाह. संपादकोए अबाहना मूळमां बाहु शब्द मानी एनो अर्थ 'without hands' (हाथ विना) एवो आप्यो छे. आ अर्थ अहीं असंगत छे ते सहेलाईथी समजाय एवं छे. रडवानुं वळी बाहु विनानुं केवु ? ए स्पष्ट छे के अबाध परथी अबाह आवेलो छे ने एनो अर्थ थाय 'अंतराय विना, अत्यंत, खूब' : 'तापथी पीडवामां आवेलो ते खूब विलपे छे.' ए नवाईनी वात छे के अन्यत्र अबाहु शब्द वपरायेलो छे त्यां संपादकोए एने अबाधमांथी व्युत्पन्न करी एनो 'without obstacle, freely' (अन्तराय विना, विन विना मुक्तपणे) एवो आप्यो छे. निर्दिष्ट प्रयोगो आ प्रमाणे छ : (१) पांचि पंचाले लिउ सनाहु, आविउ घडूठ कूयरु अबाहु (२) धाई धसई ते ऊधसई, विलसइं हसइं अबाहु बीजा उदाहरणमां 'मुक्तपणे' अर्थ चाली शके तेम छे पण ‘अन्तराय विना' एटले 'खब' ए अर्थ पण करी शकायः ‘मुक्तपणे खुब हसे छे.' पण पहेला उदाहरणमां ए अर्थ योग्य रीते बंध बेसशे नहीं. त्यां अबाहु कुंवर घटोत्कचन विशेषण छे. एटले 'जेने कशो अंतराय नडतो नथी एवो वीरपुरुष, अप्रतिरोध्य' एवो कंईक अर्थ लेवो जोईए एम लागे छे : 'अप्रतिरोध्य घटोत्कच कुंवर आव्यो.' अभोखउ. आभोखउ, अभोखण राजशीलकृत विक्रमखापराचरित्र' (संपा. कनुभाई शेट, धनवंत शाह)मां अभोखु शब्द आम वपरायेलो छ : खापरउ जाम पहुतु बारि, दीयउ अभोखु पाणीधारि. संपादके अभोखुनो 'अपोषण' अर्थ आप्यो छे. 'अपोषण' (सं. आपोशान) एटले जमती वखते, आरंभ के अंते आचमन लेबु ते. अहीं ए अर्थ केवी रीते संगत बने ? भोजनप्रसंग तो अहीं छ ज नहीं. खापरो बारणे आवे छे त्यारे तेना करवामां आवता सत्कारर्नु अहीं वर्णन छ, जेमा पाणीनी धाराथी अभोखु आपवामां आव्यु एम कहेवामां आव्युं छे. ए वर्णन आचमन साथे बंध बेसे नहीं. ए नोंधपात्र छ के साधुसुन्दरगणिकृत 'उक्तिरत्नाकर' अभोखउ (तेमज अभोखणु) शब्दनो अर्थ 'अभ्युक्षणम्' आपे छ, जेनो अर्थ थाय छे 'सिंचन, छंटकाव'. वणी अन्य कृतिओमां अभोखण शब्द वपरायेलो मळे छे त्यां बधे सत्कारनो प्रसंगसंदर्भ छे. सत्कारमा [36] Page #5 -------------------------------------------------------------------------- ________________ पाणीथी पण धोवानी प्रणालिका जूना समयमा हती. तेथी अहीं अभोखु एटले ‘सत्कार रूपे पाणी सिंचन' एवो अर्थ ज लेवो जोईए. अन्य प्रयोगो आ प्रमाणे छ : लावण्यसमयकृत 'विमलप्रबंध' (संपा. धीरजलाल ध. शाह) – सोवन करवी दीइ अभोखण, साजण हरखि भरिया. संपाद के 'आवकार' अर्थ आप्यो छे, पण 'सुवर्णनी झारीथी पाणी सींचे छे' एवो अर्थ स्पष्ट छे. 'लावण्यसमयनी लघु काव्यकृतिओ' (संपा. शिवलाल जेसलपुरा) - मनि विण अभोखण दि घणां, वीरमती मेल्हइ बेसणां. संपादके अभोखणर्नु मूळ सं. अम्भोष्ण मानी 'गरम पाणी' एवो अर्थ कर्यो छे. पण सत्कार रूपे सींचवामां आवता पाणीनो अर्थ स्पष्ट छे. बेसणां आपवार्नु पछी आवे छे ते पण सूचक छे. 'आरामशोभा रासमाळा'मा - संपुटि मिल्या बारि ए, आभोखइ आपट वारि ए लग्न वेळाए वरने पोखवामां आवे छे ते प्रसंगनो अहीं संदर्भ छे एटले संपादके अभोखइनो लीधेलो ‘सत्कार रूपे पाणीनु सिंचन करवामा' ए अर्थ यथायोग्य छे. देहलकृत ‘अभिवनऊझणु' (संपा. शिवलाल जेसलपुरा)मां अंबोषण शब्द मळे छ : राणी सुदर्शना दीथलां भृगार रे, अंबोषण सहूनि मानिं हवा. संपाद के अंबोषणनो 'कोगळा' अर्थ आप्यो छे, जे भाग्ये ज प्रस्तुत गणाय. प्रसंग महेमानोना स्वागतनो में एटले अंबोषण ते अभोखणने स्थाने आवेलो होय एम लागे छे. 'बधांने मान रूपे पाणी सिंचन करवामां आव्यु' एवो अर्थ लई शकाय छे. अवोखण, अलबत्त, शामळकृत 'सिंहासनबत्रीशी' (संपा. हरिवल्लभ भायाणी)मां ‘अपोशण' एटले 'भोजन वेळाना आचमन'ना अर्थमा वपरायेलो मळे छे : अबोट अबोखण अति घणां, को भिक्षावश थाय. ब्राह्मणना व्यवहारोना वर्णनमा आ आवे छे तेथी अबोट करवा, आचमन लेवू, भिक्षा मागवी वगेरेने ब्राह्मणना व्यवहारो तरीके समजी शकाय छे. आधी संपादके आपेलो 'अपोशण' अर्थ योग्य छे. पण ‘अभिवन-ऊझणु'मां अंबोषण ए अभोखणनो भ्रष्ट पाट होवानी शक्यता ज बलवान छे. [37] Page #6 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अमलीमाण 'ऐतिहासिक जैन काव्यसंग्रह' (संपा. अगरचंद नाहटा ) मां अमलीमान शब्द आ प्रमाण वपरायेला मळे छे : जग मांहे अमलीमान सूरि ज तेज समान संपाद के 'निर्मल मानवाला' एवो अर्थ आप्यो छे ते भूलभरेलो छे. अमली ए शब्द सं. अमर्दित परथी आवेलो छे. अमलीमान एटले जेनुं मान अमर्दित, अखंडित रघु छे एवी. "जिनराज कृति कुसुमांजलि मां पंक्ति छे : बंधव अमलीमाण. अमलीमाणनो अर्थ 'अगंजित' (अपराजित) आप्यो छे ते चाली शके. मान मर्दित न थवं एटले अपराजित रहेवुं. अमाइ, अमामो, अमाणुं, अमान 'तेरा-चौदमा शतकनां त्रण प्राचीन गुजराती काव्यो' (संपा. हरिवल्लभ भायाणी) मां अमाइ शब्द आ प्रमाणे वपरायेलो मळे छे : लहिय छिद्यं सवि दुख अमाइ संपाद के शब्दकोशमां अमा- सामे प्रश्नार्थ मूक्यो छे, परंतु एमणे आ पंक्तिनो अनुवाद 'लाग मळतां सौ दुःख आवी पडे छे' एवो आप्यो छे. अमाइनो 'आबी पडे छे', एवो अर्थ संदर्भथी बेसाडेलो छे ए स्पष्ट छे. माइ एटले 'माय, समाय'. अमाइ एनो विरोधी शब्द होवानुं समजाय छे. अमाइ एटले 'न माय' एटलेके 'ऊभराय'. 'छिद्र / लाग मळतां सौ दुःख ऊभराय छे' एम ए अर्थ बराबर बंध बेसी जाय छे. ए नोंध जोईए के राजस्थानी कोश अमाइ शब्दनो 'अप्रमाण, बहुत, 'अधिक' एवो अर्थ आपे छे, त्यां अमाइ क्रियापद नहीं पण विशेषण छे. अमा- परथी बनेलो बीजो एक विशेषणशब्द छे अमामो 'जिनराज - कृति कुसुमांजलि' मां ए वपरायेलो छे : (१) एकण दूध अमामो दीयां, घृतनो बीडो बीजी लीयो. (२) चरणकरण धन माल, अमामो लूटिसी. पहेली पंक्तिने संदर्भे संपादके 'अमूल्य' अर्थ आप्यो छे तेमां कंईक भ्रान्ति थयेली जणाय छे. अमामो शब्दना मूळमां अमा- होवानुं स्पष्ट छे, आथी एनो अर्थ 'न माय तेटलु, [ 38 ] Page #7 -------------------------------------------------------------------------- ________________ अमाप, पुष्कळ' एम ज लेवो जोईए. दूधने अमूल्य कहेवामां कई स्वारस्य नथी, घणुं दूध आयु एम ज अभिप्रेत होई शके. बीजी पंक्तिमां पण 'पुष्कळ'नो अर्थ बराबर बेसी जाय छे. राजस्थानी कोश अमाव शब्द 'खूब, बेहद'ना अर्थमा नोंधे छे ते अमाप साथे तेम अमामो साथे संबद्ध गणाय. भगवद्गोमंडल तथा बृहद् गुजराती शब्दकोश अमामो शब्द नो 'अमूल्य' अर्थ आपे छे ते पण भ्रान्त गणवू जोईए. भगवद् गोमंडले 'आनंदकाव्यमहोदधि'मांथी ‘पण साटुं बाझे नहीं, कहे अमामो माल' त उदाहरण आप्यं छे तेमां पहेली दृष्टिा 'अमूल्य' अर्थ बेसी जाय, पण समग्र प्रयोग परंपरा जोतां 'अमाप, पुष्कळ' ए अर्थ ज लेवो जोईए. प्रसंगसंदर्भ मळे तो आ वात वधारे सारी रीते स्थापित करी शकाय. . 'अखानी काव्यकृतिओ' (संपा. शिवलाल जेसलपुरा)मां अमाणु, अमान, अमानी मळे छे ते पण अमा- साथे संकळायेला ज मानवा जोईए : भाईओ ! भव संताप, भात देखीने भूलएं, अक्षर अमाणु आप, आठे पहोर अखो कहे. संपादके अमापुंना मूळमां अरबी अमान शब्द मानी 'रक्षण' एवो अर्थ आप्यो छे तेने संदर्भमां केवी रीते बेसाडवो ते कोयडो ज छे. अमाणुं एटले ‘मान - माप वगरनु, अनंत' एवो अर्थ लेतां वाक्यार्थ बराबर बेसी जाय छे : 'आत्मतत्त्व अक्षर अने अनंत छे.' ए अनुभव अद्भुत अमान. संपादके अमान शब्द ना बे अर्थ आप्या छे. सं. अ-मान एटले 'अहंभाव विनानो' अने अरबी अमान एटले 'निर्भयतानो, अमरत्वनो'. मान शब्द संस्कृतमा 'माप'ना अर्थमां पण छे ए संपादकने स्मरणमां आव्युं नथी तेथी ज आवा अर्थोमां खेंचाई जवानुं बन्युं छे. अहीं पण पंक्तिनो अर्थ स्पष्ट छ : “ए अनुभव अद्भुत अने अमाप, अनंत छ.' / पिंड-ब्रह्मांड ते काच ज स्थानी, तेहेनुं पोषण वस्तु सदा अमानी. संपादके अमानीनो ‘मानी शकाय नहीं तेवो' एवो अर्थ आप्यो छे त्यां वळी, एमां मान शब्द रहेलो होवानुं वीसराई जवाथी त्रीजा ज भळता अर्थ तरफ खेंचाई जवा बन्युं छे. अहीं 'वस्तु' शब्द स्त्रीलिंगनो होवाथी अमानतुं अमानी थयुं छे. 'आप' अमान, पण 'वस्तु' अमानी. अर्थ तो एक ज छे. वस्तु एटले ब्रह्मने 'अमाप, अनंत' कहेवामां आवेल छे. [39]