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कन्हैयालाल लोढ़ा, एम. ए. [जैनधर्म व दर्शन के विशिष्टअध्येता]
चिकित्सा-शास्त्र और मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में 'कर्म-सिद्धान्त : भाग्य-निर्माण की कला'
जगत के मौलिक पदार्थ
जब हम जगत पर नजर डालते हैं तो दो प्रकार की वस्तुएं या पदार्थ दिखाई देते हैं। एक प्रकार के पदार्थ तो वे हैं जिनमें इच्छाएं हैं, भावनाएं हैं, विचार हैं, ज्ञान है, संज्ञाएं हैं। जिन्हें सुख-दुःख का संवेदन होता है। जो श्वास लेते हैं, भोजन करते हैं व उसे पचाते हैं। जिनका शरीर बढ़ता है, मरता है। दूसरे प्रकार के पदार्थ वे हैं जिनमें प्रथम प्रकार के पदार्थों में बतलायी हुई कोई भी क्रिया नहीं होती है। विज्ञान की भाषा में प्रथम प्रकार के पदार्थों को जीवधारी एवं दूसरे प्रकार के पदार्थों को भौतिक कहा जाता है। जैन दर्शन में भी जगत में इन दो ही प्रकार के पदार्थों का अस्तित्व स्वीकार किया गया है। जैन दर्शन में प्रथम प्रकार के पदार्थों को जीव, आत्मा या चेतन कहा है तथा दूसरे प्रकार के पदार्थों को अजीव कहा है। अजीव या भौतिक पदार्थों की क्रिया प्रकृति के आधीन होती है। उसकी किसी भी क्रिया में उसका अपना कोई प्रयत्न या पुरुषार्थ नहीं होता है । जीव की क्रिया में जीव स्वयं का भावात्मक या क्रियात्मक पुरुषार्थ भी करता है। विकार की प्रक्रिया
प्रत्येक वस्तु या पदार्थ का निजी या मौलिक स्वभाव होता है। उस पदार्थ के स्वभाव से मेल खानेवाली अर्थात् समान स्वभाववाली वस्तु या पदार्थ सजातीय कहलाता है। उस पदार्थ के स्वभाव से भिन्न-विपरीत या विषम-स्वभाववाला पदार्थ विजातीय कहलाता है। यह भौतिक शास्त्र एवं चिकित्सा-शास्त्र का नियम है कि जब किसी पदार्थ का विजातीय पदार्थ से संयोग होता है तो उनका एक दूसरे पर प्रभाव पड़ता है जिससे उनमें विकार उत्पन्न हो जाता है। शुद्ध जल का शुद्ध जल से संयोग होता है तो उसमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होता है, संमिश्रित जल भी शुद्ध ही रहता है। परन्तु शुद्ध जल में मिट्टी या रंग मिलता है तो विकृत हो जाता है, स्वर्ण से जब चांदी या तांबा का संयोग होता है तो वह विकृत हो जाता है।
हमारे शरीर की प्रकृति या स्वभाव से जिन पदार्थों की प्रकृति मेल नहीं खाती है वे शरीर के लिए विजातीय पदार्थ हैं। जब ऐसे विजातीय पदार्थों का शरीर में प्रवेश हो जाता है तो शरीर में उनका विपरीत प्रभाव पड़ता है जिससे शरीर में विकार उत्पन्न हो जाता है। शरीर उस विकार को बाहर निकालने की क्रिया करता है उसे ही रोग कहा जाता है। रोग का वास्तविक रूप हैशरीर में विजातीय द्रव्य से जो क्रिया (Action) होती है, उसके प्रति शरीर के द्वारा की गई प्रतिक्रिया (Reaction)। उदाहरण के लिए शरीर की प्रकृति से विष की प्रकृति विपरीत होती है
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कर्म-सिद्धान्त : भाग्य-निर्माण की कला
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अतः विष जैसे ही शरीर में प्रवेश करता है शरीर में वमन, दस्त आदि प्रतिक्रियाएं उत्पन्न हो जाती हैं। किसी व्यक्ति के शरीर में रक्त की कमी को दूर करने के लिए अन्य व्यक्ति का रक्त प्रवेश कराया जाता है तो दोनों रक्तों को रासायनिक तत्वों में विषमता होने पर तत्काल शरीर में स्थित रक्त प्रविष्ट रक्त के प्रति अपनी प्रतिक्रिया प्रारंभ कर देता है। हृदय, गुर्दा आदि अंगरोपण में भी शरीर समान स्वभाववाले अंगों को ही स्वीकार करता है, भिन्न स्वभाव वाले को नहीं।
निर्जीव पदार्थों में भी विजातीय द्रव्य से मिलने पर विकार तो उत्पन्न होता है परन्तु वे अपनी ओर से प्रतिक्रिया करने का प्रयत्न नहीं करते हैं। उनमें जो भी क्रियाएं होती हैं वे प्राकृतिक नियमानुसार स्वतः होती हैं । उनमें क्रियाएं ही होती हैं, प्रतिक्रियाएं नहीं । स्वर्ण में मिले हुए ताँबे को निकालने का यत्न स्वर्ण नहीं करता है। परन्तु सजीव पदार्थ में यह विशेषता है कि वह विजातीय द्रव्य के संयोग को बरदाश्त नहीं करता है। वह उसे निकालने के लिए स्वयं प्रयत्न करता है। शरीर, इन्द्रिय, रक्त, चर्म आदि जब तक जीव से संयुक्त हैं सजीव हैं। तब तक इनमें किञ्चित् भी विजातीय द्रव्य का संयोग हुआ नहीं कि उसे निकालने का प्रयत्न प्रारंभ कर देते हैं। पैर में काँटे का कण भी प्रवेश कर जाय, नेत्र में रेणु का अणु भी प्रवेश कर जाय तो उसे निकाले बिना चैन नहीं पड़ता है।
तात्पर्य यह है कि सजीव विजातीय द्रव्य के संयोग से विकारग्रस्त होता है और उसका यह विकार रोग के रूप में प्रकट होता है। इसी सिद्धान्त की गहराई में प्रवेश करने पर तो ज्ञात होता है कि जीव के लिए अजीव मात्र विजातीय द्रव्य है। दोनों द्रव्यों के स्वभाव में मौलिक भिन्नता है, असमानता है, विषमता है। जीव का स्वभाव उपयोग है, चिन्मयता है, जानने, अनुभव करने का गुण है। अजीव का स्वभाव जड़ता है। अतः जब जीव के साथ अजीव का संयोग होता है तो जीव में विकार उत्पन्न हो जाता है। जीव के साथ अजीव के संयोग रूप विकार को ही जैनदर्शन में कर्म कहा है।
कर्म-सिद्धान्त : चिकित्साशास्त्र के परिप्रेक्ष्य में
जिस प्रकार चिकित्साशास्त्र में रोगी व रोग का रूप, रोग का प्रकार, रोग के कारण, रोग रोकने के उपाय, रोग घटाने वाले पथ्य, रोग बढ़ाने वाले कुपथ्य, रोग का उपचार, रोग रहित अवस्था का स्वरूप आदि का वर्णन है। चिकित्साशास्त्र के ये सब अध्याय उसी चिकित्सा पद्धति का रूप धारण कर लेते हैं जिस अंग की चिकित्सा करने का लक्ष्य है। नेत्र से संबंधित नेत्र चिकित्सा, कर्ण से संबंधित कर्ण चिकित्सा, शरीर से संबंधित शारीरिक चिकित्सा, मन से सम्बन्धित मानसिक चिकित्सा कही जाती है। इसी प्रकार आत्मा से संबंधित विकारों के वर्णन को आध्यात्मिक चिकित्सा भी कहा जा सकता है। जीव को रोगी के रूप में और कर्म को रोग के रूप में लिया जाय और फिर गहराई से देखा जाय तो ज्ञात होगा कि जैन तत्वज्ञान आध्यात्मिक चिकित्सा का ही अनुसरण करता है। जैन तत्वज्ञान को आध्यात्मिक चिकित्साशास्त्र के रूप में देखा जाय तो रोगी का वर्णन जीवतत्व में, रोगोत्पादक पदार्थ का वर्णन अजीवतत्व में, रोगी के रूपों व प्रकारों का वर्णन बंधतत्व में, रोगोत्पत्ति के कारणों का वर्णन आश्रव तत्व में, रोगों के रोकने के उपायों का वर्णन संवरतत्व में, रोगों के उपचार का वर्णन निर्जरा तत्व में, रोग रहित पूर्ण स्वस्थ अवस्था का मोक्षतत्व में, रोगोत्पादक कुपथ्य चर्या-कार्यों का वर्णन पापतत्व में एवं स्वास्थ्य प्रदायक सुपथ्य चर्या-कार्यों का वर्णन पुण्यतत्व के रूप में किया गया है। इस प्रकार जैन तत्वज्ञान को आध्यात्मिक चिकित्साशास्त्र कहा जा सकता है ।
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धर्म और दर्शन
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कर्मसिद्धान्त की व्यापकता
अन्य समस्त चिकित्सा शास्त्रों से आध्यात्मिक चिकित्सा शास्त्र का क्षेत्र व्यापक है। कारण कि नेत्र चिकित्साशास्त्र का क्षेत्र नेत्र तक सीमित है, शारीरिक चिकित्साशास्त्र का क्षेत्र शरीर तक सीमित है जिसमें नेत्र, कान, नाक, हाथ, पैर आदि सभी सम्मिलित हैं, अतः नेत्र चिकित्सा से इसका क्षेत्र अधिक व्यापक है । शारीरिक चिकित्सा से मानसिक चिकित्सा का क्षेत्र अधिक व्यापक है। शारीरिक रोगों का मन से घनिष्ट संबंध होने में मानसिक चिकित्सा में मन के विकारों की चिकित्सा के साथ शारीरिक रोगों की चिकित्सा भी आ जाती है। मानसिक चिकित्सा से आध्यात्मिक चिकित्सा का क्षेत्र अति व्यापक है। इसमें उपर्युक्त सब प्रकार की चिकित्साएँ तो आ ही जाती हैं कारण कि शरीर और मन के रोगों का मूल कारण तो आत्मा के विकार रूप कर्म ही हैं। साथ ही आत्मा के जन्म, मरण, रोग-शोक, सुख-दुःख, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों, सफलता-विफलता आदि जीवन से संबंधित समस्त घटनाओं की उत्पत्ति का संबंध भी प्राणी के अपने कर्मों से ही हैं। अतः जीवन से संबंधित प्रत्येक क्षेत्र का समावेश आध्यात्मिक चिकित्सा में हो जाता है। - आधुनिक मनोविज्ञान ने भी कर्म सिद्धान्त के इस तथ्य को स्वीकार किया है कि प्राणी के तन-मन एवं जीवन की समस्त स्थितियों का निर्माण उसके अंतस्तल में छिपे भावों के अनुसार ही होता है। हृदय में भय का भाव उत्पन्न होते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। आंतें कार्य करना बंद कर देती हैं इसी कारण से जंगल में शेर को सामने देखते ही पाजामे में टट्री-पेशाब लग जाते हैं। क्रोध उत्पन्न होने पर खून खौलने लग जाता है। शरीर का ताप और रक्त का चाप बढ़ जाता है। मान का मद चढ़ते ही व्यक्ति अपनी यथार्थ स्थिति से विस्मृत हो अनाप-शनाप खर्च करने व बलिदान होने को तैयार हो जाता है । जोश में होश खो बैठता है और ऐसा आचरण करने लगता है जो स्वयं के लिए घातक है। प्रियजन की मृत्यु के शोक से पाचन शक्ति क्षीण हो जाती है। मुंह में भोजन-ग्रास लेते ही उल्टी होने लगती है। चिन्ता से हृदयरोग, अलसर, रक्तचाप, दुर्बलता, विक्षिप्तता का होना, सर्व साधारण को विदित है। यह तो हुई (हृदय, फेफड़े, रक्त, पाचन आदि) शारीरिक अंगों व संस्थानों की संचालन क्रिया पर भावनाओं का प्रभाव पड़ने की बात ।
परन्तु इससे भी अधिक विस्मयकारी बात तो आधुनिक वैज्ञानिकों का यह कथन है कि भावों का प्रभाव केवल शरीर के श्वसन, पाचन, रक्त संचरण आदि संस्थानों की संचालन क्रिया पर तो पड़ता ही है साथ ही उनकी संरचना पर भी पड़ता है। उनका कथन है कि व्यक्ति के मस्तिष्क, आँख, नाक, कान, बाल, रक्त, हाथ-पैर की संरचना तथा हाथ-पैर-मस्तिष्क की रेखाओं तक के निर्माण में भी उस व्यक्ति के भावों का ही हाथ है। इनके आकार-प्रकार के निर्माण के साथ जिन तत्वों से ये अंग बने हैं उन तत्वों में भी भावों के साथ रासायनिक परिवर्तन होते रहते हैं। इधर जिस क्षण व्यक्ति के भावों में परिवर्तन होता है उधर उतने ही अंशों में उन तत्वों में भी रासायनिक परिवर्तन हो जाता है जिससे मस्तिष्क, रक्त, बाल, हड्डी आदि का निर्माण हुआ है।
रूस में एक वैज्ञानिक है जो मृत मनुष्य की खोपड़ी की हड्डियों को देखकर, उस मनुष्य की जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत की सब घटनाओं को इस प्रकार पढ़ लेते हैं मानों वे उसकी आत्मकथा पढ़ रहे हों। यहाँ तक कि वह व्यक्ति मरते समय किस भावावेश में था तथा किस प्रकार के विष देने से मरा यह भी बतला देते हैं। आज किसी भी मनुष्य के बाल की रासायनिक क्रियाओं का विश्लेषण करके, उसके स्वभाव की, अपराध आदि वृत्तियों का पता चलाने का विज्ञान भी विकसित हो गया है। हड्डी और बाल दोनों शरीर में सब से अधिक ठोस एवं सब से कम
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कर्म सिद्धान्त भाग्य निर्माण की कला ३८१ संवेदन की वस्तुएं हैं जब उनके आकार-प्रकार व संरचना का भी मानव की प्रकृति व प्रवृत्ति का इतना संबंध है तो मानव के श्वसन, पाचन आदि अन्य संस्थानों की संरचना व संचालन के साथ भावों का अत्यंत घनिष्ट सम्बन्ध हो तो आश्चर्य की बात ही क्या है। वर्तमान में ऐसी मशीन का भी आविष्कार हो गया है जो मनुष्य के मस्तिष्क पर लगा देने पर यह बतला देती है कि यह मनुष्य सच बोल रहा है अथवा झूठ ।
कर्मसिद्धान्त का महत्व
ही व्यक्तियों को है। यह सर्वविदित है कि
ऊपर शारीरिक रोग और शरीर संरचना के साथ जिस मन के घनिष्ट सम्बन्ध के विषय में कहा गया है, इसे मनोविज्ञान में चेतनमन एवं कर्म सिद्धान्त में द्रव्यमन कहा जाता है। इस मन का निर्माण करने वाली एक और शक्ति है उसे मनोविज्ञान में अचेतनमन कहा जाता है और जैन दर्शन में कर्म या कार्मण शरीर कहा जाता है। इसका निर्माता है आत्मा । आत्मा अनंत विलक्षण गुण एवं शक्ति का भंडार है आत्मा की इस विलक्षणता का ज्ञान बिरले आज जड़ परमाणु की शक्ति के ज्ञान ने जगत को विस्मय में डाल दिया है। चेतन की शक्ति के समक्ष जड़ की शक्ति नगण्य है। वेतन श की शक्ति को प्रकट करने, नियंत्रण करके उपयोग करनेवाला है । अतः जब जड़ परमाणु की आंतरिक शक्ति ही इतनी आश्चर्यकारी है तो जड़ के नियन्ता चेतन की आन्तरिक शक्ति कितनी चमत्कारिक होगी. इसकी कल्पना भी संभव नहीं है। जिस प्रकार जड़ परमाणु की शक्ति का संहार में भी उपयोग हो सकता है और सर्जन में भी । इसी प्रकार चैतन्य की शक्ति का भी विनाश में भी योग हो सकता है और विकास में भी चैतन्य की शक्ति का उपयोग हिंसा, झूठ, ईर्ष्या, अपकार, प्रतिशोध आदि पाप प्रवृत्तियों में करना अपने जीवन का विनाश करता है, आपत्तियों विपत्तियों को आधि-व्याधि उपाधियों को निमंत्रण देना है। चैतन्य शक्ति का उपयोग करुणा, सेवा, परोपकार आदि सद्-प्रवृत्तियों में करना अपने जीवन का विकास करना है। कारण कि प्रवृत्ति के अनुरूप प्रकृति का निर्माण होता है। प्रकृति से वातावरण का निर्माण होता है। वातावरण से जीवन का निर्माण होता है। अतः चेतन जैसी शुभ-अशुभ प्रवृत्ति करता है वैसा ही उसके सुखदायी दुखदायी जीवन का निर्माण होता है। कर्म सिद्धान्त इस तथ्य को युक्तियुक्त सुन्दर वैज्ञानिक शैली में प्रस्तुत करता है। अतः कर्म-सिद्धान्त का शास्त्र भाग्य के संविधान का ही शास्त्र है।
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आधुनिक मनोविज्ञान के शीर्षस्थ विद्वान् 'चार्ल्स युग' का कथन है कि मनुष्य अपने व्यक्तित्व को उतनी ही दूर तक बढ़ा सकता है जितनी दूर तक वह अज्ञात मन की गहराई में छिपी शक्तियों को जानता है एवं उनका नियंत्रण करता है । उस अज्ञात मन में बिना भौतिक साधनों के दूरस्थ की घटनाओं को देखने की शक्ति है जान सकता है एवं बहुत दूर तक भविष्य का दर्शन भी कर सकता है ।
तथा वह अतीत काल में हुई घटनाओं को
अभिप्राय यह है कि हमारे भावों एवं प्रवृत्तियों से ही हमारे जीवन का व्यक्तित्व का निर्माण होता है। हमारी प्रवृत्तियों से कर्म का निर्माण होता है। कर्म की प्रकृति के अनुसार शरीर और जीवन की प्रत्येक घटना का निर्माण होता है। हमारे सुख-दुःख, सफलता-असफलता, जयपराजय सम्पन्नता विपन्नता, प्रभाव अभाव आदि सब का मूल हमारा कर्म ही का फल है। हमारा वर्तमान जीवन हमारे कर्म का ही परिणाम है । हमारे जीवन के सुख-दुःख आदि का दायित्व हमारे पर ही है। कर्मफल का ही दूसरा नाम भाग्य है। अपने भाग्यविधाता हम स्वयं ही हैं। हमारी आत्मा ही हमारे भाग्य की निर्णायक है। हमारा ब्रह्म ही भाग्य को अंकित करने वाला ब्रह्मा है, हमारी आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई हमारे भाग्य का लिपि-लेखक ब्रह्मा नहीं है।
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आयाय प्रवत अभिनन्द आआनन्द अथव श्री
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धर्म और दर्शन
कर्म सिद्धान्त के सूत्र भाग्य के संविधान के सूत्र हैं। जिस प्रकार विधान संस्थानसंचालन व संरचना के नियमों का निदर्शक होता है उसी प्रकार कर्म सिद्धान्त भी जीवन संचालन व संरचना के नियमों के निदर्शक है। जिनका ज्ञान करके एवं तदनुकूल आचरण करके मानव मात्र अपनी इच्छानुसार सौभाग्यमय जीवन का निर्माण कर सकता है एवं ऐसे शाश्वत परमानंद के क्षेत्र में प्रवेश कर सकता है जहाँ जन्म, मरण, रोग, शोक, दु:ख, दारिद्रय, का अस्तित्व ही नहीं है। कर्म-बंध की प्रक्रिया
पहले कहा गया है कि चेतन में अपने विरोधी स्वभाव वाले अचेतन पदार्थ के संयोग से कर्म रूपी विकार उत्पन्न होता है। कर्मोत्पत्ति की प्रक्रिया में वही नियम काम करते हैं जो रोगोत्पत्ति की प्रक्रिया में काम करते हैं। जिस प्रकार शारीरिक रोग की उत्पत्ति के चार रूप होते हैं, (१) रोग का प्रकार या प्रकृति, (२) शरीर में प्रविष्ट रोगोत्पादक विष की मात्रा, (३) रोग कितने समय तक टिकने वाला है, रोग की कालावधि और (४) रोग किस रूप में प्रकट होकर फल देने वाला है। इसीप्रकार आत्मिक रोग-विकार कर्म की उत्पत्ति या कर्मबंध के भी चार रूप हैं :(१) प्रकृतिबंध, (२) प्रदेशबंध, (३) स्थितिबंध और (४) अनुभागबंध । कर्मबंध ने इन चारों रूपों को नीचे शारीरिक रोगों के चारों रूपों के आधार पर प्रस्तुत किया जाता हैप्रकृतिबंध
जिस प्रकार व्यक्ति द्वारा ग्रहण किया गया प्रत्येक पदार्थ अपनी प्रकृति के अनुसार शरीर में अलग-अलग प्रभाव के रूप में प्रकट होता है। इमली वात प्रकृति वाली है, दही व दूध घृत कफ प्रकृति वाले हैं। मच्छर काटने का विष मलेरिया पैदा करने की प्रकृति वाला है, बावले कुत्ते का विष पागलपन पैदा करने की प्रकृति वाला है, अफीम, धतूरा, संखिया आदि विष अपनी अलगअलग प्रकृति वाले हैं। इसीप्रकार मन, वचन, काया की प्रत्येक प्रवृत्ति अलग-अलग कर्म प्रकृति पैदा करने वाली है । ज्ञान में बाधा डालनेवाली, ज्ञानी व ज्ञान का अनादर करने वाली प्रवृत्ति ज्ञान में बाधा डालने वाली प्रकृति का रूप धारण करती है। इसकी प्रकार कोई प्रवृत्ति दर्शन में, कोई प्रवृत्ति आनंद में, कोई प्रवृत्ति सामर्थ्य के प्रकटीकरण में बाधा डालती है। जैसे व्यक्ति द्वारा ग्रहण किये गए दूध, घृत, रोटी आदि कुछ पदार्थ शरीर का निर्माण वृद्धि, पुष्टि करने वाले होते हैं इसी प्रकार मन, वचन काया की कुछ प्रवृत्तियां शरीर, आयु, संवेदन शक्ति आदि के निर्माण करने वाली होती हैं। मन, वचन, काया के स्पंदन-प्रवृत्ति, क्रिया से उसी स्थान में स्थित कार्मण वर्गणाएँ आकृष्ट होकर आत्मा के साथ एकीभूत हो जाती है वे वैसा ही रूप ग्रहण कर लेती है जैसी प्रवृत्ति होती है। कर्म सिद्धान्त के नियमानुसार प्राणी की प्रवृत्ति ही प्रकृति का रूप धारण करती है । सूत्र है-जैसी प्रवृत्ति वैसी प्रकृति । प्रवृत्तियां अगणित हैं अतः कर्म प्रकृतियां भी अगणित हैं परन्तु कर्म ग्रंथों में उन सबका वर्गीकरण आठ मूल प्रकृतियों में, एक सौ अठावन उत्तर प्रकृतियों के रूप में कर दिया गया है। प्रकृति स्वभाव का पर्यायवाची है। कर्म की आठ मूल प्रवृत्तियाँ हैं यथा(१) ज्ञानावरणीय, (२) दर्शनावरणीय, (३) वेदनीय, (४) मोहनीय, (५) आयु, (६) नाम, (७) गोत्र और (८) अंतराय। जिस प्रकार अलग-अलग प्रकार के विष या पदार्थ शरीर में अलगअलग प्रकार के विकार उत्पन्न करते हैं इसी प्रकार प्राणी की प्रवृत्तियां या भाव भी आत्मा में अलगअलग प्रकार की कर्म प्रकृतियां उत्पन्न करते हैं। जैसे कोई विष मस्तिष्क में विकार उत्पन्न कर विक्षिप्त बनाता है, विचार शक्ति को कुंठित करता है इसी प्रकार जो प्रवृत्ति या भाव आत्मा के ज्ञान को विकृत करती व कुंठित करती है उसे ज्ञानावरणीय कर्म प्रकृति कहा है। कोई विष आँख की देखने
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कर्म-सिद्धान्त : भाग्य-निर्माण की कला
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की शक्ति को क्षीण करता है इसी प्रकार जो प्रवृत्ति व भाव आत्मा की साक्षात्कार करने की शक्ति को क्षीण या कुंठित करती है उसे दर्शनावरणीय कर्म प्रकृति कहा गया है जिस प्रकार चंदन शरीर में शीतलता एवं किचमिची खुजली पैदा करती है इसी प्रकार जो प्रवृत्तियां आत्मा को साता-असाता देती हैं वे वेदनीय कर्म की प्रकृतियां कही जाती हैं। जिस प्रकार शराब शरीर से बेभान, मोहित करती है उसी प्रकार जो प्रवृत्तियां या भाव आत्मा को अपने स्वरूप या स्मृति को भुलाती हैं वे मोहनीय की प्रकृतियां कहलाती हैं। जिस प्रकार कुछ पदार्थों का सेवन शरीर को जीवनी शक्ति देकर टिकाये रखते हैं इसी प्रकार जो प्रवृत्तियां या भाव शरीर को निश्चित समय तक टिकाये रखने की शक्ति देती हैं उन्हें आयु की प्रकृतियां कहा जाता है। जिस प्रकार कुछ प्रकार के पदार्थ का सेवन शरीर, इन्द्रिय आदि के निर्माण व पुष्ट अथवा क्षीण करने वाले होते हैं इसी प्रकार जिन प्रवृत्तियों या भावों से शरीर, इन्द्रिय, अंगोपांग के निर्माण, पुष्ट व क्षीण करने वाली आंतरिक शक्ति उत्पन्न होती है वे नाम कर्म की प्रकृतियां कही गई हैं। जिस प्रकार कुछ पदार्थ शरीर में विशेष प्रकार की प्रकृति उत्पन्न करने वाले होते हैं इसी प्रकार जिन प्रवृत्तियों से शरीर की रचना उच्च या नीच संस्कार ग्रहण योग्य हो वे गोत्र कर्म की प्रकृतियां कही जाती हैं। जिस प्रकार कुछ विष या पदार्थ शरीर, इन्द्रिय, मन, प्राण की शक्ति को क्षीण करने वाले होते हैं ऐसे ही कुछ प्रवृत्तियां या भाव आत्मा की शक्तियों को क्षीण करने वाली होती हैं इन्हें अन्तराय कर्म की प्रकृतियां कहा जाता है। प्रवृत्तियों व भावों के अनुरूप ही प्रकृतियों का निर्माण होता है । अत: जहाँ-जहाँ ऊपर प्रकृति व भाव कहा गया है वहाँ तत्संबंधी प्रकृतियों का भी अन्तर्भाव कर लेना चाहिए।
कर्म की इन आठ मूल प्रकृतियों की उत्तर प्रकृतियाँ एक सौ अठावन हैं, उनको भी चिकित्सा शास्त्र की उपर्युक्त पद्धति से समझ लेना चाहिए। विस्तारभय से उनका वर्णन यहाँ नहीं किया । गया है।
प्रदेशबंध मन, वचन और काया की प्रवृत्तियों से वहीं स्थित सुक्ष्म कार्मण वर्गणाएँ आकृष्ट होती हैं और जब वे आत्मा के साथ संबद्ध या एकीभूत हो जाती हैं तो कर्म कही जाती हैं। उन कर्मों के समुदाय में भी परमाणु हैं। उन परमाणुओं के परिमाण या मात्रा को जो आत्मा से बंधी हुई हैं उसे प्रदेशबंध कहा जाता है।
प्रदेशबंध को शरीर में प्रविष्ट विष या विकार की मात्रा से समझा जा सकता है । शरीर में विषैले कीटाणुओं एवं विकारोत्पादक पदार्थ जितने अधिक सक्रिय होते हैं उतनी ही अधिक मात्रा में रोग की विद्यमानता हो जाती है। इसी प्रकार मन, वचन, काया की प्रवृत्तियां जितनी अधिक सक्रिय होती हैं उतनी ही अधिक मात्रा में कार्मण वर्गणाएँ खिचती हैं और आत्मा से संबद्ध हो जाती हैं, इसे ही प्रदेशबंध कहा जाता है।
अनुभागबंध आत्मा से सम्बद्ध कर्मों की फलदान शक्ति को अनुभागबंध कहा जाता है। जिस प्रकार शरीर का हर विकार अपना फल अलग-अलग रूप में देता है, मंदाग्नि अतिदस्त या कब्ज के रूप में अपना फल देती है। हैजा दस्त-उल्टी के रूप में, जुकाम सिरदर्द व खाँसी के रूप में, मलेरिया सिरदर्द, उल्टी, ज्वर के रूप में अपना-अपना फल देते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक कर्म अपना अलग-अलग फल देते हैं। किसी कर्म का फल कठोर होता है तो किसी का मदु । किसी का फल सबल होता है तो किसी कर्म का फल निर्बल । कर्म में फलदान शक्ति कषाय के कारण से होती है। कषाय अर्थात् राग द्वेष भाव, जितना प्रमाद होगा कर्म का फल भी उतना ही प्रगाढ़ व सबल होगा।
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आयायप्रवयव अभिनंद श्री आनन्दन ग्रन्थ
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श्री आनन्द श्रीआनन्दत्र ग्रन्थ
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धर्म और दर्शन
कषाय या राग-द्वेष- मोह भाव से आत्मा का कर्म के साथ तादात्म्य होता है । जितना कषाय गाढ़ा होगा कर्म परमाणु उतनी ही प्रगाढ़ता से आत्मा के साथ एकीभूत होगा और उनका फल भी उतनी ही प्रबलता से मिलेगा। जिस प्रकार जो विकार शरीर के साथ अधिक तादात्म्य एकरूपता को प्राप्त होता है वह उतना ही अधिक फल देता है । उसी प्रकार जिस प्रवृत्ति में कषाय जितना अधिक तीव्र होगा वह प्रकृति उतना ही अधिक फलदान करेगी ।
स्थितिबंध
आत्मा से बंधे कर्म जितने समय तक आत्मा के साथ रहते हैं उस समय की अवधि को स्थितिबंध कहते हैं। जिस प्रकार प्रत्येक शारीरिक विकार अलग-अलग समय तक अपना फल देता है । किसी को मलेरिया ज्वर दो दिन रहता है किसी को नौ दिन । कभी सिर दर्द कुछ समय तक रहता है कभी बहुत समय तक इसी प्रकार कोई कर्मबंध बहुत समय तक फल देता है, कोई कम समय तक । कर्म का यह स्थितिबंध कथाय के परिमाण (Quantity ) के अनुसार होता है।
मन, वचन, काया की प्रवृत्ति को योग कहते हैं। राग-द्वेष भाव को कपाय कहते हैं। योग के प्रकार - परिणाम ( Quality ) के अनुसार प्रकृतिबंध होता है। योग के परिमाण (Quantity) के अनुसार प्रदेशबंध होता है। कषाय के परिणाम ( Quality ) के अनुसार अनुभागबंध होता है और कषाय के परिमाण (Quantity) के अनुसार स्थितिबंध होता है।
कर्म बंध का मूलाधार परिणाम ( भावना) है जिस प्रकार जैसा बीज होता है वैसा हो फल है, इसी प्रकार जैसा परिणाम ( भावना) होती है वैसा ही परिणाम (फल) आता है। भावना रूप परिणाम ही फल रूप परिणाम का कारण है। यादृशी भावना तादृशी सिद्धिर्भवति । प्राणी भाव से भाग्यवान बनता है और भाव से भगवान भी बन सकता है ।
कर्म के प्रकार
कर्म को हम अशुभ और शुभ इन दो रूपों में वर्गीकरण कर सकते हैं । अशुभ कर्म कुपथ्य के समान अहितकारी हैं और शुभ कर्म सुपथ्य या अनुपान के समान हितकारी हैं। जिस प्रकार कुपथ्य सेवन से शारीरिक रोग बढ़ता है और पथ्य सेवन से रोग घटता है एवं सामर्थ्य व स्वास्थ्य की वृद्धि होती है । इसी प्रकार अशुभ कर्मों से दुःखदायी स्थितियों की वृद्धि होती है और शुभ कर्मों से आत्मा के सामर्थ्य व स्वस्थता में वृद्धि होती है । अशुभ कर्मों को कर्म - विज्ञान में पापकर्म व शुभकर्मों को पुण्यकर्म कहा है। पापकर्म हैं हिंसा, झूठ, चोरी, मंथन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, कलह, अभ्याख्यान, चुगली, निंदा, रति, अरति, छल-प्रपंच, मिथ्यात्व आदि । पुण्यकर्म हैं- परोपकार, सेवा व मन, वचन, काया से दूसरों का हित करना है।
शुभ से अशुभ का ह्रास होता है। जितनी शुभ प्रवृत्तियों की वृद्धि होगी उतनी ही अशुभ प्रवृत्तियों में कमी होती जायेगी। जिस प्रकार पथ्य का सेवन कुपथ्य के दुष्प्रभाव को घटाता है। इसी । प्रकार पुण्य प्रवृत्तियां पाप प्रवृत्तियों के दुष्परिणाम को घटाती हैं । जिस प्रकार जितना रोग घटता जाता है उतना ही शरीर का सामर्थ्य एवं स्वास्थ्य बढ़ता जाता है। इसी प्रकार जितना पाप प्रकृतियों का जोर घटता जाता है उतनी आत्मा की शक्ति बढ़ती है। आत्मा स्वस्थ होती जाती है । आत्मा
का विकास होता जाता है और आत्मा का विकास इन्द्रियवृद्धि प्राणवृद्धि, ज्ञानवृद्धि, बुद्धिवृद्धि वैभवृद्धि के रूप में प्रकट होता है।
'पुनाति आत्मानं इति पुण्यः', जो आत्मा को पवित्र करे, वह पुण्य है । आत्मा मैली होती है कषाय के कलुष से अतः जिससे कषाय में मंदता आवे वह पुष्प है। जिस प्रकार अशोधित विष शरीर में विकार उत्पन्न करता है, स्वास्थ्य का घात करता है, अहितकारी है । परन्तु वही शोधित कर दिया जाय और फिर लिया जाय तो स्वास्थ्यकारी हो जाता है । इसी प्रकार प्रवृत्ति जब,
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कर्म सिद्धान्त भाग्य निर्माण कला ३८५ भोग या पाप रूप होती है तो आत्मा के लिए अहितकारी होती है और वही प्रवृत्ति सेवा या पुण्य रूप होती है तो हितकारी हो जाती है । जिस प्रकार शराब पीने से मोह ( बेहोशी ) ग्रस्त व्यक्ति में जड़ता आ जाती है, उस की मस्तिष्क व इन्द्रियों की संवेदन शक्ति बहुत घट जाती है फिर जैसे-जैसे उनका मोह नशा घटता जाता है उसकी मन, बुद्धि, इन्द्रियों की शक्तियां बढ़ती जाती हैं । इसी प्रकार पाप प्रकृतियों आत्मा को मोहग्रस्त बेहोश करती हैं। उसमें जड़ता आ जाती है और उसकी मन, मति व इन्द्रिय शक्ति घट जाती है अतः वह चेतना का जहाँ विकास अत्यन्त कम है ऐसे वनस्पति आदि में जन्म लेता है । फिर जैसे-जैसे मोह (जड़ता ) घटता जाता है उसमें चेतनता का विकास होता जाता है, उसकी इन्द्रिय, मन, बुद्धि में वृद्धि होती जाती है । हम प्रत्यक्ष देखते हैं कि हमारी राग-द्वेष की मात्रा जितनी कम होती जाती है उतने ही हम तटस्थ होते जाते हैं और हमारे सोचने-विचारने, अनुभव - संवेदन करने की शक्ति बढ़ती जाती है । कषाय की मन्दता रूप पुण्य से ही प्राणी को इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि की उपलब्धि होती है ।
भाग्यपरिवर्तन की प्रक्रिया करण कर्म सिद्धान्त में जहां एक ओर यह विधान-नियम है कि बंधा हुआ कर्म फल दिए बिना कभी नहीं छूटता है वहीं दूसरी ओर उन नियमों का भी विधान है जिनसे बन्धे हुए कर्मों में परिवर्तन भी किया जा सकता है। इन्हीं नियमों को कर्मशास्त्र में करण कहा गया है। करण एक प्रकार से भाग्य परिवर्तन की प्रक्रिया है । करण के आठ प्रकार हैं : - ( १ ) बन्धन करण ( २ ) नित्त करण ( ३ ) निकाचना करण (४) उदवर्तना करण ( ५ ) अपवर्तना करण ( ६ ) संक्रमण करण (७) उदीरणा करण और (८) उपमशना करण करण उसे कहा जाता है जिसकी सहायता से क्रिया या कार्य हो । अर्थात् जो क्रिया या कार्य में कारण हो, हेतु हो । इन आठ प्रकारों से कर्म में क्रिया होती है। अतः इन्हें करण कहा जाता है। इन्हें भाग्य परिवर्तन के हेतु भी कहा जा सकता है ।
बन्धन करण
जिसके कारण आत्मा कर्म को ग्रहण कर बन्धन को प्राप्त हो वह बन्धन करण है । जिस प्रकार शरीर द्वारा ग्रहण किया गया पदार्थ शरीर के लिए हित-अहित का कारण बनता है । इसी प्रकार आत्मा द्वारा ग्रहण किए गए शुभ-अशुभ कर्म परमाणु आत्मा के लिए सौभाग्य-दुर्भाग्य के कारण बनते हैं। अतः जो दुर्भाग्य को दूर रखना चाहते हैं उन्हें अशुभ पाप प्रवृत्तियों से बचना चाहिये। जो सौभाग्य चाहते हैं उन्हें सेवा, परोपकार, वात्सल्य भाव आदि शुभ प्रवृत्तियों को अपनाना चाहिये ।
निधत्त करण
वह क्रिया जिससे पूर्व में बन्धे कर्म दृढ़ हों, निधत्त कहलाती है। जिस प्रकार किसी को ज्वर हो और वह उस अवस्था में घृत - तेल आदि का सेवन करे तो वह ज्वर कष्टसाध्य हो जाता है अथवा किसी को अफीम का नशा करने की आदत हो और फिर गाँजे व सुलफे का नशा करने का निमित्त मिल जावे तो वह अफीम के नशे की आदत दृढ़ हो जाती है फिर प्रयत्नों से मात्रा में कमी- ज्यादा तो हो सकती है परन्तु सदा के लिए आदत मिटना कठिन हो जाता है । प्रतिदिन समय पर नशा करना ही पड़ता है। इसी प्रकार किसी कर्मप्रकृति का बन्ध शिथिल हो परन्तु उसी की सहयोगी अन्य प्रकृतियों का निमित्त मिल जाता है तो वह दृढ़ हो जाती है फिर प्रयत्नों से साधारण सा फेरफार तो हो सकता है परन्तु उसका रूपान्तरण व मिटना सम्भव न हो । कर्म का
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इस अवस्था का प्राप्त होना निधत्तकरण कहलाता है। अतः ज्ञानीजनों का कर्तव्य है कि अपनी अशुभ प्रवृत्ति को बल देने वाली अन्य अधम प्रवृत्तियों से अपने को बचावें । निकाचना करण
वह क्रिया जिससे कर्म ऐसे दृढ़तम हो जायें कि फिर उसमें किसी भी प्रकार का कुछ भी परिवर्तन सम्भव ही न रहे, निकाचना करण कहलाता है। जिस प्रकार कोई साधारण सा साध्य अथवा कष्ट साध्य रोग अपनी वृद्धि के अनुकूल साधन पाकर असाध्य रोग का रूप धारण कर लेता है फिर उस पर दवा-उपचार कारगर नहीं होता है, उसे भोगना ही पड़ता है-जैसे कैंसर रोग । इसी प्रकार कर्म भी कषाय की प्रबलता को पाकर दृढ़तम बन्ध को प्राप्त हो जाता है। उसका आत्मा से इतना प्रगाढ़ सम्बन्ध स्थापित हो जाता है कि उसे भोगना ही पड़ता है । अत: बन्ध के इस निकाचना स्वरूप को ध्यान में रखते हुए ज्ञानी जनों का कर्तव्य है कि अपनी पाप प्रकृतियों के रस में निमग्न न होवें । जलकमलवत् निलिप्त रहने का ध्यान रखें। उद्वर्तना करण
जिस कारण से कर्म की स्थिति और रस बढ़ जाता है, उसे उद्वर्तना करण कहते हैं। जिस प्रकार खाँसी घृत-तेल आदि से बढ़ जाती है और अधिक काल तक कष्ट देती है। इसी प्रकार किसी प्रवृत्ति में बार-बार रस लेने से उस प्रवृत्ति से सम्बन्धित प्रकृति में अधिक फलदान करने एवं अधिक समय तक टिकने की शक्ति आ जाती है । अतः हित इसी में है कि पाप प्रवृत्तियों की पुनरावृत्ति से बचा जाय, उनमें कम से कम रस लिया जाय। अपवर्तना करण
जिस कारण से कर्म की स्थिति और रस घट जाता है, उसे अपवर्तना करण कहते हैं। जिस प्रकार पित्त का रोग नींबू-आलूबुखारा खाने से घटता है । तीव्र क्रोध का वेग जल पीने से घटता है । इसी प्रकार किए गए दुष्कर्मों के प्रति पश्चात्ताप व प्रायश्चित्त आदि करने से उनकी फलदान शक्ति घटती है। अत: रति या अविरति को त्यागने व विरति को अपनाने में आत्मा का हित है। संक्रमण करण
जिस कारण से पूर्व में बन्धे कर्म की प्रकृति अपनी सजातीय प्रकृति में रूपान्तरित हो जाती है, उसे संक्रमण करण कहते हैं । जिस प्रकार शरीर के विकारग्रस्त अंग हृदय, नेत्र आदि को हटाकर उनके स्थान पर स्वस्थ हृदय, नेत्र का आरोपण करने से रोगी को दुहारा लाभ होता है-बीमारी के कष्ट से बचना एवं स्वस्य अंग की शक्ति-सुख को पाना। इसी प्रकार अशुभ कर्म प्रकृति को अपनी सजातीय शुभ कर्म प्रकृति में बदला जा सकता है। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे मार्गान्तरीकरण (Sublimation of Mentalenegy) कहा जाता है।
कुत्सित प्रकृतियों को उदात्त प्रकृतियों में मार्गान्तरीकरण या रूपान्तरणकरण को वर्तमान मनोविज्ञान में उदात्तीकरण कहा गया है। इसका अपराधी या दोषी मनोवृत्तियों के व्यक्तियों को सुधारने में उपयोग किया जाता है। अपनी उपयोगिता के कारण मार्गान्तरीकरण-उदात्तीकरण मनोविज्ञान का प्रधान अंग बन गया है तथा इसके विभिन्न रूप प्रस्तुत किए गए हैं यथा-तोड़फोड़ करने वाले, अनुशासन हीन छात्रों को उनकी रुचि के रचनात्मक कार्य में लगाकर उनकी मनोवृत्ति बदली जाती है। तीव्र रोग या शरीर के प्रति कामवासना (कुत्सित भाव) का उदात्तीकरण गुणानुराग, भक्तिभाव, कला या काव्य रचना में किया जा सकता है।
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कुत्सित प्रकृतियों को सद् प्रकृतियों में संक्रमण करण या उदात्तीकरण के लिए आवश्यक है कि पहले व्यक्ति के हृदय में भोगों के क्षणिक अस्थायी सुख के स्थान पर स्थायी सुख प्राप्ति का भाव जागृत किया जाय । भावी सुख के लिए तात्कालिक क्षणिक सुख का त्याग करने की प्रेरणा दी जाय। इस प्रकार प्रथम स्वार्थपरक आत्मसंयम की योग्गता पैदा होती है फिर दूसरों के सुख के लिए अपने सुख का त्याग करने की योग्यता आती है। इससे स्थायी आनन्द के रसास्वादन का अनुभव होता है। रसास्वादन का यह बीज सेवाभाव, परोपकार के रूप में पल्लवित, पुष्पित व फलित होता है । और अन्त में सर्वहितकारी प्रवृत्ति का रूप ले लेता है।
जिस प्रकार मनोविज्ञान में मार्गान्तरीकरण या उदात्तीकरण केवल सजातीय प्रवृत्तियों में ही सम्भव माना है विजातीय प्रवृत्तियों में नहीं। इसी प्रकार कर्म-विज्ञान में संक्रमण केवल सजातीय प्रकृतियों में सम्भव माना है विजातीय प्रकृतियों में नहीं। यह समानता आश्चर्यजनक है । मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि उदात्तीकरण शारीरिक एवं मानसिक रोगों के उपचार में, जीवन के उत्थान में बड़ा कारगर उपाय है। मनोविज्ञानशालाओं में असाध्य प्रतीत होने वाले महारोग भी उदात्तीकरण से ठीक होते देखे गये हैं।
जिस प्रकार अशुभ प्रवृत्तियों का शुभ प्रवृत्तियों में रूपान्तरण होता है, यह जीवन के उत्थान में उपयोगी है। इसी प्रकार शुभ प्रवृत्तियों का भी अशुभ प्रवृत्तियों में रूपान्तरण-संक्रमण होता है यह जीवन के अधःपतन का कारण बनता है । सज्जन, भले व्यक्ति जब कुसंगति, कुत्सित वातावरण में पड़ जाते हैं और उससे प्रभावित हो जाते हैं तो उनकी शुभ प्रवृत्तियाँ अशुभ प्रवृत्तियों में परिवर्तित हो जाती है जिससे उनका मानसिक एवं नैतिक पतन हो जाता है। परिणामस्वरूप उनके समक्ष अनेक कष्ट, विपत्तियाँ, रोग, अशांति, रिक्तता, हीनभावना, अनिद्रा आदि अवांछनीय स्थितियाँ उपस्थित हो जाती हैं।
जिस प्रकार मनोविज्ञान में मार्गान्तरीकरण का महत्त्वपूर्ण स्थान है उसी प्रकार कर्मविज्ञान में संक्रमण करण का महत्त्वपूर्ण स्थान है। कषाय पाहुड की टीका जयधवला में संक्रमण करण का विस्तार में महाभारत ही बन गया है । उद्वर्तन, अपवर्तन आदि करण संक्रमण करण के ही अंग हैं।
अभिप्राय यह है कि संक्रमण करण के सिद्धान्तों का अनुसरण कर व्यक्ति नर से नारायण, भिखारी से भगवान, हीन से महान, दुरात्मा से महात्मा, भाग्यहीन से भाग्यवान, दु:खी से सुखी बन सकता है तथा अपने जीवन को पतन से बचा सकता है, अपने भाग्य का इच्छानुसार निर्माण कर सकता है। आपत्तियों एवं विपत्तियों से अपनी रक्षा कर सकता है। प्रसन्नचन्द राजर्षि ध्यान में स्थित थे तब राहगीर से जब यह सुना कि शत्रु मेरी अनुपस्थिति का लाभ उठाकर मेरे राज्य को छीनने को उतारू हो गया है तो उनका हृदय तीव्र कषाय से भर गया और सातवें नर्क की मनोस्थिति बन गई, तत्काल विवेक से मानसिक प्रवृत्ति में संक्रमण किया और केवलज्ञान को प्राप्त हो गये, यह है संक्रमण करण का चमत्कार ।
उदीरणा करण जिस कारण से कर्म स्वाभाविक उदय में आने के समय के पूर्व ही प्रयत्न या पुरुषार्थ से उदय में लाकर फल पा लेना उदीरणाकरण है। जिस प्रकार शरीर में स्थित कोई विकास कालान्तर में रोग रूप में फल देने वाला है उसके फल को टीका लगा अथवा दवा आदि के प्रयत्न द्वारा पहले ही पा लेने से विकार से शीघ्र मुक्ति मिल जाती है। उदाहरणार्थ-चेचक का टीका लगाने से चेचक का विकार समय से पहले अपना फल दे देता है फिर आगे उससे छुटकारा मिल जाता है। पेट में
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आंव की बीमारी में, दस्त लगने की दवा देकर पहले ही अधिक दस्तें लगवा दी जायें तो पेट में से दूषित मल जो पीछे धीरे-धीरे निकलता वह पहले ही निकल जाता है और रोग से समय पहले छुटकारा मिल जाता है। इसी प्रकार कर्म की ग्रंथियों को भी प्रयत्न से समय के पूर्व उदय में लाया जा सकता है तथा उनका फल भोगा जा सकता है। कर्मों की उदीरणा प्राणी के सहज प्रयत्नों से चलती रहती है परन्तु अन्तर में अज्ञात गहराई में छिपे कर्मों की उदीरणा के लिए विशेष पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। आधुनिक मनोविज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है और विश्व विख्यात मनोवैज्ञानिक डा० फायड ने अज्ञात मन में स्थित मानसिक ग्रन्थियों को ज्ञात मन के स्तर पर लाने की पद्धति प्रस्तुत की है। इसे मनोविश्लेषण पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति से भीतर अज्ञात मन में छिपी हुई ग्रंथियाँ, कुंठाएं, वासनाएं, कामनाएं ज्ञात मन में प्रकट होती हैं और उनका फल भोग कर लिया जाता है तो वे नष्ट हो जाती हैं ।
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आधुनिक मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि मानव की अधिकतर शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों का कारण ये अज्ञात मन में छिपी ग्रन्थियाँ ही हैं जिनका संचय हमारे पहले के जीवन में हुआ है। अतः जब ये ग्रन्थियों बाहर प्रकट होकर नष्ट हो जाती हैं तो इनसे सम्बन्धित बीमारियाँ भी मिट जाती हैं। वर्तमान में मानसिक चिकित्सा में इस पद्धति का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
अपने द्वारा हुए पापों या दोषों को स्मृतिपटल पर लाकर गुरु के समक्ष प्रकट करना, उनकी आलोचना करना, प्रतिक्रमण करना उदीरणा या मनोविश्लेषण पद्धति का ही रूप है। इससे साधारण दोष- दुष्कृत मिथ्या हो जाते हैं, नष्ट हो जाते हैं । यदि दोष अति प्रगाढ़ हो, भारी हो तो उसके नाश के लिए प्रायश्चित लिया जाता है। प्रतिक्रमण कर्मों की उदीरणा में बड़ा सहायक है। हम प्रतिक्रमण के उपयोग से अपने दुष्कर्मों की उदीरणा करते रहें तो कर्मों का संचय घटता जायेगा । जिससे आत्मा में आरोग्य की वृद्धि होगी। जो शारीरिक एवं मानसिक आरोग्य, समता, शांति एवं प्रसन्नता के रूप में प्रकट होगी ।
उपशमना करण
कर्म का उदय में आने के अयोग्य हो जाना उपशमना करण है। जिस प्रकार शरीर में आपरेशन, घाव आदि से उत्पन्न पीड़ा का कष्ट अनुभव न होने देने के लिए इन्जेक्शन या दवा दी जाती है जिससे पीड़ा या दर्द का शमन हो जाता है, कारण विद्यमान रहने पर भी उसके परिणाम
से रोगी उस समय बचा रहता है। इसी प्रकार ज्ञान और क्रिया के विशेष प्रयत्न से कर्म प्रकृतियों का कुफल शमन किया जा सकता है, अन्तस्तल में भोग्यमान प्रकृतियां कारण रूप में विद्यमान रहने दवा से दर्द का शमन घाव भरता रहता है। स्थिति, प्रदेश बंध
पर उनके परिणाम से बचा जा सकता है । परन्तु जिस प्रकार इन्जेक्शन या
रहने पर भी आपरेशन के घाव इसी प्रकार कर्म - प्रकृतियों के घटता रह सकता है ।
करण के ज्ञान की उपयोगिता
कर्म या भाग्य - निर्माण के नियमों का ज्ञान करना आवश्यक है । इन नियमों को जानकर तद्नुसार आचरण करे तो अभीष्ट भाग्य का निर्माण किया जा सकता है। बंधन करण की उपयोगिता या लाभ अशुभ कर्मबंध न बांधकर शुभ कर्मबंध बांधने में है अथवा कर्मबंध से बचने में है। नियत्तकरण की उपयोगिता ऐसी प्रवृत्ति व भावों से बचने में जिनसे कर्म दृढ़ होते हैं। निकाचना करण की उपयोगिता ऐसी प्रवृत्ति व भावों से बचने में पूर्ण सावधान रहने में है जिनसे ऐसे कर्म बंध
भरने का जो समय है वह घटता रहता है, फलभोग का शमन होने पर भी उनका प्रकृति,
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जायें जिनको अवश्यमेव भोगना ही पड़े। उद्वर्तना व अपवर्तना करण की उपयोगिता इस में है कि इस प्रकार की प्रवृत्ति व भाव करना चाहिये जिससे दुष्कर्म घटे व शुभ कर्म बढ़े। संक्रमण करण की उपयोगिता अनिष्ट व कुफल फलदायी पाप प्रवृत्तियों को इष्ट व सुफलदायी पुण्य प्रकृतियों में रूपान्तरण करने में है। उदीरणा करण का लाभ कर्म को प्रयत्न द्वारा समय से पूर्व उदय में लाकर अल्पफल भोगते हुए क्षय कर दिया जाय । उपशमना करण का लाभ है प्रयत्न द्वारा उदय को निष्फल बना देना। इस प्रकार कर्म-विज्ञान का करणज्ञान कर्म या भाग्य निर्माण की परिवर्तन, परिवर्धन, परिशमन, परिशोधन, संरचना, संक्रमण करने की कला का ज्ञान है।
___ जिस प्रकार शारीरिक या मानसिक चिकित्साशास्त्र के दो प्रधान विभाग होते हैं, एक में शरीर या मन की संरचना व उनमें उत्पन्न होने वाले विकारों का स्वरूप निरूपण होता है, दूसरे में शरीर या मन में उत्पन्न विकारों का उपचार । इसी प्रकार आध्यात्मिक चिकित्साशास्त्र या कर्मविज्ञान के भी दो विभाग हैं-प्रथम आत्मा में उत्पन्न विकारों के स्वरूप का निरूपण करनेवाला
और दूसरा उन विकारों को दूर करने का उपचार बताने वाला। प्रथम विभाग का बंधतत्त्व के रूप में निरूपण है जिसका बंध के प्रकार व करण के रूप में ऊपर संक्षिप्त विवेचन दिया गया है, इसका विस्तृत वर्णन लाखों श्लोक प्रमाण बीसों कर्म ग्रंथों में आज भी विद्यमान है। दूसरा विभाग उपचार का है। उपचार का ही दूसरा नाम साधना है, इसके भी दो खण्ड हैं-प्रथम विकारोत्पत्ति को रोकने के उपाय बनानेवाला इसे संवर तत्व कहा जाता है और दूसरा खण्ड है संचित विकारों के नाश के उपायों का ज्ञान करानेवाला, इसे निर्जरा तत्व कहा जाता है।
संवर-दुर्भाग्य से बचने के उपाय (१) अज्ञान (२) असंयम (३) लापरवाही (४) लोलुपता और (५) अनुचित प्रवृत्तियाँ ये पांच बातें जिस प्रकार शारीरिक एवं मानसिक विकारोत्पत्ति में कारण हैं उसी प्रकार आत्मिक विकारोत्पत्ति (कर्मबंध) में भी कारण हैं। कर्मबंध के इन कारणों को अध्यात्म शास्त्र में आश्रव कहा जाता है। इनका विस्तृत वर्णन आश्रव तत्व में किया गया है ।
इन पापों का त्याग कर देना ही विकारोत्पत्ति से बचने का उपाय है। अध्यात्म शास्त्र में इनसे बचने के उपायों को संवर कहा है, कर्मबंध रोकने का उपाय कहा है। प्राणी का जीवन तन, मन व वचन की सक्रियता पर निर्भर है। अतः जब तक जीवन है तब तक इनकी सक्रियता रहती है। या यों कहें कि जब तक तन-मन सक्रिय हैं तभी तक जीवन है। आशय यह है कि जब तक जीवन है तब तक तन-मन अवश्य सक्रिय रहने वाले हैं। मरने पर ही इनकी निष्क्रियता संभव है। सक्रियता का ही दूसरा नाम प्रवृत्ति या व्यवसाय है। अतः उपयुक्त पांचों कारण जो असद्प्रवृत्तियों के रूप में हैं इन्हें सद्प्रवृत्तियों में परिणत कर दिया जाय । इन पांचों आश्रव द्वारों के स्थान पर (१) सम्यक्त्व, (२) विरति (३) अप्रमाद (४) अकषाय और (५) शुभ योग को स्थान देना ही संवर है।
सम्यक्त्व-अपना हित किस में है, अहित किस में, यह विवेक होना ही सम्यक्त्व है । जिस प्रकार हिताहित का विवेक होने से व्यक्ति ऐसे पदार्थों का सेवन करता है जो शरीर के लिए हितकारी हैं, विकार उत्पन्न नहीं करने वाले हैं। इसी प्रकार हिताहित का विवेक होने से व्यक्ति को पाप कार्यों से बचने का ज्ञान होता है और वह अपने को अहितकारी वृत्तियों से बचाता रहता है।
विरति- भोग रोग के कारण हैं। विवेक से यह जानकर भोगों से विरत होना, संयम धारण करना विरति है । जिस प्रकार खान-पान, रहन-सहन का असंयम शारीरिक रोगों का कारण
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होता है एवं संयम शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्ति का कारण होता है। इसी प्रकार असंयम आत्मिक विकार (कर्म) उत्पत्ति का कारण होता है और संयम आत्मा के निर्विकारी व स्वस्थ बनाने में कारण होता है।
अप्रमाद-अपने कल्याण के प्रति सजग रहना अप्रमाद है। जिस प्रकार रोगी लापरवाही करने और अपने को रोगोत्पादक वातावरण व पदार्थों से न बचावे तो रोग की वृद्धि होती है और स्वास्थ्यप्रदायक पथ्य और उपचार का बराबर ध्यान रखे तो शरीर शीघ्र स्वस्थ बनता है। इसी प्रकार व्यक्ति पाप से बचने के प्रति एवं चारित्र को ऊँचा उठाने के प्रति जितना सजग रहता है, उतना ही जीवन का उत्थान होता है। उतना ही अधिक निर्विकार बनता है।
अकषाय-राग-द्वेष की वृत्तियाँ कषाय कही जाती हैं। कषाय से ही कर्मों का स्थिति और अनुभाग बंध होता है। जिस प्रकार कलुष, कषैले पदार्थ शरीर में रोगोत्पत्ति के कारण होते हैं इसी प्रकार कषाय आत्मा के विकारोत्पत्ति का कारण है। कषाय से ही कर्म में फल देने की शक्ति आती है। अतः जितना कषाय कम होगा कर्म उतना ही निर्बल व अल्प समय टिकने वाला होगा।
शुभयोग-मन, वचन व काया की शुभ प्रवृत्ति को शुभ योग कहते हैं । जिस प्रकार शरीर की अहितकर प्रवृत्तियाँ-गलत ढंग से बैठना, उठना, चलना, खाना, काम करना आदि-शरीर में रोगोत्पत्ति की कारण होती हैं और स्वास्थ्यवर्द्धक ढंग से उठना, बैठना, खाना, पीना आदि से स्वास्थ्य की वृद्धि होती है। इसी प्रकार मन, वचन, काया की पापमय अशुभ प्रवृत्तियों से आत्मा के अकल्याणकारी कर्म-विकारों का बंध होता है । पुण्य व संयममय शुभ प्रवृत्तियों से आत्मा के विकार नष्ट होते हैं एवं आत्म-विकास में सहायक सामग्री मिलती है।
चिकित्साशास्त्र में रोगोपचार में पथ्य व अनुपान का जो स्थान है वही स्थान आध्यात्मिक उपचार में-कर्म-विज्ञान में शुभयोग व पुण्य का है। अनुपान या पथ्य उपचार का, औषधि का सहायक अंग है उसी प्रकार पुण्य भी संवर-निर्जरा का सहायक अंग है। जिस प्रकार पूर्ण स्वस्थ होने पर औषधि का कार्य समाप्त हो जाता है फिर न औषधि की आवश्यकता रहती है और न अनुपान की। इसी प्रकार आत्मा के पूर्ण स्वस्थ, निर्विकार, कर्म रहित हो जाने पर न संवर-निर्जरा की जरूरत रहती है न पुण्य या शुभ योग की।
निर्जरा--जिन कारणों से संचित कर्म क्षय हों उन्हें निर्जरा कहते हैं । जिस प्रकार शारीरिक विकार दो प्रकार से नष्ट होते हैं-एक प्रकार है रोग के रूप में प्रकट होकर स्वतः समाप्त होना और दूसरा प्रकार है औषधि से बिना अपना परिणाम दिखाये ही समाप्त होना । इसी प्रकार निर्जरा के भी दो प्रकार हैं-प्रथम प्रकार है कर्म स्वतः यथासमय अपना फल देकर नष्ट हो जाते हैं, इसे सविपाक निर्जरा कहते हैं । दूसरा प्रकार है प्रयत्न पूर्वक बिना फल दिये ही कर्मों को क्षय कर देना, इसे अविपाक निर्जरा कहते हैं। शारीरिक चिकित्सा शास्त्र में जो स्थान उपचार का है वही स्थान कर्म-सिद्धान्त में अविपाक निर्जरा का है। जिस प्रकार शारीरिक चिकित्साशास्त्र में उपवास, औषध, सेवा-शुश्रूषा आदि उपचार के अनेक रूप हैं इसी प्रकार आध्यात्मिक चिकित्साशास्त्र--कर्म-सिद्धान्त में, अविपाक निर्जरा में उपवास, प्रोषध, सेवा-शुश्रूषा, ध्यान आदि आत्म-विकारक्षय के अनेक रूप हैं । चिकित्साशास्त्र के साथ इनकी क्या संगति है, यह स्वतन्त्र लेख का विषय है।
मोक्ष-जैनधर्म का मुख्य उद्देश्य या लक्ष्य मुक्ति या मोक्ष है। आत्मा का अपने सर्वविकारों को नष्ट कर स्व में स्थिति हो जाना अर्थात् स्वस्थ हो जाना ही मोक्ष है। यह विकारों से सर्वथा मुक्ति की स्थिति है, इसीलिए इसे मुक्ति कहा गया है । आत्मा का पूर्ण निर्विकार, स्वस्थ अवस्था ही
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________________ कर्म-सिद्धान्त : भाग्य निर्माण कला माग्य निमाण कला 361 जया या मोक्ष है। चिकित्साशास्त्र का मुख्य उद्देश्य भी आरोग्य या स्वास्थ्यप्राप्ति है। शरीर या मन का विजातीय द्रव्यों के प्रभाव या विकारों से मुक्ति ही आरोग्य या स्वास्थ्य कहलाता है। इस प्रकार चिकित्साशास्त्र और कर्म-सिद्धान्त, इन दोनों में उद्देश्य या लक्ष्य की दृष्टि से भी आश्चर्यजनक समानता है, एक ही रूप है-निविकार-स्वस्थ अवस्था की प्राप्ति / जिस प्रकार शरीर के निर्माण एवं शारीरिक चिकित्सा में घनिष्ट सम्बन्ध है / इसी प्रकार भाग्य-निर्माण और आत्मा के विकार दूर करने की प्रक्रिया (आध्यात्मिक चिकित्सा) में भी घनिष्ट सम्बन्ध है। कर्मवाद भाग्यनिर्माण और आध्यात्मिक चिकित्सा इन दोनों को एक साथ प्रस्तुत करता है। कारण कि जैसे-जैसे आत्मा के विकार दूर होते जाते हैं, क्षीण होते जाते हैं वैसे-वैसे भाग्य का उत्थान होता जाता है। कर्म-सिद्धान्त का उपयोग कर मानव अपने जीवन का सर्वांगीण विकास कर सकता है। अपने आन्तरिक विलक्षण अतीन्द्रिय शक्तियों को प्रकट कर सकता है। अपने शारीरिक और मानसिक विकारों को दूर कर सकता है / स्वर्ग के साम्राज्य में प्रवेश कर मुक्ति के महल में पहुंच सकता है / इसी जीवन में स्थायी शान्ति एवं परमानन्द की प्राप्ति कर सकता है। कर्मवाद और मनोविज्ञान आत्मा का सब से अधिक निकट का सम्बन्ध मन से है। अतः कर्म-सिद्धान्त का सब से निकट का सम्बन्ध मनोविज्ञान से है। मनोविज्ञान की शाखा परामनोविज्ञान है / जिसका कार्य है मन के गहरे अज्ञात स्तरों की खोज करना। परामनोविज्ञान और कर्म-सिद्धान्त में इतनी समानता है कि ये दोनों प्रायः एक ही से प्रतीत होते हैं। महान मनोवैज्ञानिक डा० चार्ल्स युग महाशय मन को अमर मानते हैं। उनका कथन है कि शरीर नष्ट हो जाता है परन्तु मन विद्यमान रहता है। युंग महाशय' ने अज्ञात मन के स्वरूप का जैसा वर्णन किया है वह जैन आगमों में कर्म समुदायधारी कार्मण शरीर से बहुत मिलता है। परामनोविज्ञान अभी अपनी शैशव अवस्था ही में है फिर भी उसकी जो खोजें सामने आई हैं उन्होंने कर्मवाद के अनेक गहन सिद्धान्तों को पुष्ट कर दिया है एवं उनकी उपयोगिता को भी प्रस्तुत किया है। कर्म की रचना भावों व प्रवृत्तियों से होती है। भावों से सम्बन्धित ज्ञान की खोज ही मनोविज्ञान का विषय है / अतः कर्मवाद में मनोविज्ञान गर्मित ही है। अन्तर केवल यही है कि कर्मसिद्धान्त मनोविज्ञान के समस्त पक्षों को एवं उससे भी परे स्थित आत्मा के स्वरूप को प्रस्तुत करता है जबकि आधुनिक मनोविज्ञान अभी मन के भी अत्यल्प क्षेत्र का ज्ञान कर पाया है इसलिए अधूरा है। जैसे-जैसे मनोविज्ञान की खोज आगे बढ़ती जायेगी वैसे-वैसे वह कर्म सिद्धान्तों को स्थान देता जायेगा। लेख की सीमा को ध्यान में रखकर मैंने प्रस्तुत लेख में कर्म-सिद्धान्त के मनोवैज्ञानिक रूप को यत्र-तत्र केवल संकेतात्मक रूप में ही प्रस्तुत किया है। कर्म-सिद्धान्त का क्षेत्र इतना व्यापक है व इसके इतने पक्ष हैं कि इन सबका मनोवैज्ञानिक विवेचन किया जाय तो सैकड़ों ग्रन्थ बन जाने की सम्भावना है / यह कार्य किसी व्यक्ति विशेष का न होकर सम्पूर्ण समाज का है। अतः मेरा समस्त समाज के तत्त्ववेत्ताओं व कर्णधारों से निवेदन है कि वे इसमें अपना योग देकर विश्व का कल्याण करें। I ? The Modern man in Search of a Soul, p. 213 .......andr. nRJAAAJAARAKHANNALAAdamadraMNJAD.ma.. SALAnnathunJAARRIANORADA श्रीआनन्द अथश्रीआनन्द अन्य rapemarwanamarpawimmameramanaraa m anawimarwas