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अपभ्रश चरिउ काव्यों की भाषिक संरचनाएँ 0 डॉ० कृष्णकुमार शर्मा, रीडर, हिन्दी विभाग, उदयपुर विश्वविद्यालय, उदयपुर
अपभ्रंश के चरिउकाव्य जहाँ कथारस, रचयिता की धर्मदृष्टि और सन्देश (message) के समन्वित रूप हैं वहाँ भाषा के कलात्मक-प्रयोग के भी निदर्शन है। प्रत्येक काव्य एक सन्देश होता है यह सन्देश मनुष्य की किसी भी वृत्ति से सम्बद्ध हो सकता है। इसी सन्देश के लिए रचयिता एक मोटिफ तलाशता है, वस्तुत: जब कभी कहानी में प्रतिपाद्य को समेटा जाता है तभी उसके अस्तित्व के लिए मोटिफ अपेक्षित हो उठता है। यह मोटिफ ही घटना को सार्थकता के साथ नियन्त्रित करता है, सन्दर्भो को समायोजित करता है। मोटिफ की घटनाएँ लेखक के अनुभव-संसार से गुजरकर, उसकी दृष्टि संवेदना की संवाहक बनकर आती है। कालविशेष और भाषाविशेष में जब एकाधिक रचनाकार एक ही दृष्टि-संवेदना से प्रेरित होते हैं तो एक ही मोटिफ किंचित् अन्तर के साथ सभी में प्रसरित होता दिखाई पड़ता है । अन्तर, इस प्रसरण के बीच में आने वाली घटनाओं का क्रम अथवा बाह्य खप में दिखाई पड़ सकता है। मोटिफ की समरूपता भाषा-संरचना की समरूपता में भी सिद्ध होती है और भाषा-संरचना-प्रयोग की समरूपता संरचना आवर्तन में दृष्टिगोचर होती है । एक रचनाकार ही नहीं, समान सन्दर्भो के आवर्तन में सभी रचनाकार भाषा-संरचना का भी आवर्तन करते हैं । सन्दर्भ और संरचना की यह पारस्परिक प्रतिबद्धता ही शैलीचिह्नक (style marker) की धारणा के मूल में हैं। और शैलीचिह्नकों की समानता के आधार पर ही काव्य-प्रवृत्तियाँ निर्धारित की जाती हैं। अपभ्रंश काव्य के कुछ सर्वनिष्ठ सन्दर्भो और उन सन्दर्भो की अभिव्यक्ति हेतु प्रयुक्त भाषिक संरचना का परीक्षण करने पर यह स्थिति स्पष्ट हो जाती है, कुछ सन्दर्भ यहाँ दिये जा रहे हैं।
संघाधिपति का आगमन अथवा वर्णन और भगवान का वर्णन अपभ्रंश काव्यों का ऐसा सन्दर्भ है जो प्रत्येक काव्य में आता है। कवि इस सन्दर्भ में कथ्यछाया में अन्तर कर सकता है, बिम्ब और प्रतीक में भी वैविध्य मिलता है पर भाषा-संरचना लगभग एक-सी होती है। सन्दर्भ १ : दिव्य व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह
इस सन्दर्भ में रचनाकारों ने दिव्य-व्यक्ति के दिव्यत्व, श्रेष्ठत्व, संसार से विरागत्व, उसके प्रति पूज्य भाव आदि का वर्णन प्रायः किया है। स्वयंभू के पउमचरिउ में ऋषिसंघ का यह प्रसंग देखें
तहि अवसरे आइउ सवण संघु, पर समय समीरण-गिरि अलंघु ॥ दुम्महमह वम्मह महण सोलु, भयभंगुर भुअणुद्धरण लीलु ॥ अहि विसम-विसम-विस-वेय समणु, खम-दम-णिसेणि किम-मोक्ख-गमणु ॥ तवसिरी वर रामलिगियंगु, , कलि-कलुस-सलिल सोसण पयंगु ॥ तित्थंकर-चरणम्बरूह भमरू, किम मोह महासुर णयर-डमरू ॥
--(पउमचरिउ, संधि २२, ४) उपर्युक्त प्रसंग की भाषिक संरचना हैक्रि० वि० पदबंध+कर्ता प. बं+विशेषण प० ब,+वि-प. बं+-----वि०प० बं,
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इसी प्रकार भगवान का एक सन्दर्भ जंबुसामिचरिउ में द्रष्टव्य है
तहो तले कणय रयणहरि - विट्ठरे, किरणाहयसुरिद सेहरकरे ॥ पत्तपत्ततिछत्तालकिए. देवकुमार भुक्ककुसुमं किए
॥
दुन्दुहिसद्ध नियपडिसद्दए "I
पामरकर पसर महुए, दिव्वए सव्वाणि परिमाणिए, सयल भाससंबलिए वाणिए ।
11
घामंडलमसाठिउ
इस प्रसंग की भाषिक संरचना है
क्रि० वि० पदबंध + विशेषण ष० बं, + वि० प० बं2 +
उपर्युक्त प्रसंग में
विशेषण पद बन्ध, +
• संरचना है और विशेषण पदबन्ध भी
अपभ्रंश चरिउ काव्यों की भाषिक संरचनाएं
"
रचना का ही आवर्तन हुआ है।
+ वि० प० बंधू
दोनों प्रसंगों में एक अन्तर है कर्ता प० बं० के नियोजन का । अन्यथा क्रि० वि० से प्रारम्भ संरचना में समान संरचनावाले विशेषण पदबन्धों का आवर्तन दोनों उद्धरणों में है । इस प्रकार का आवर्तन विशेष्य की एक-एक विशेषता की पर्तें क्रमशः खोलता जाता है । रचयिताकृत शब्दचयन, बिम्बनिर्मायक तत्व चयन, प्रतीक चयन आदि का कौशल इस आवर्तन में स्पष्ट देखा जा सकता है । णायकुमारचरिउ में सरस्वती वर्णन का निम्नलिखित प्रसंग भी आवर्तन के चमत्कार का उदाहरण है
दुबिहालंकारे विष्णुरंति, लीला कोमलई दिति ॥ महकवणिणि संचरंति, बहुहावभावविन्मम धरति ॥ सुपसत्यें अत्यं दिहि करंति, सव्वई विष्णाणई संभरति ॥ पोसेस देसभासद चयंति, लक्खण विसिट्ठई बस्यति ॥
मुक्तरूपिम = बद्धरूपिम 'टा' + क्रियापद
"विशेषण पदबन्धक + विशेष्य प० बं
,
करकंड चरिउ में शील मुनि के सन्दर्भ की निम्नलिखित संरचना भी द्रष्टव्य है
जसु
दंसणे हरि उवसमु सरेइ करिकुम्भहो गाहु ण सो करेइ ॥ अवरुप्परु वइरइ जे बहंति, तहो दंसणे महुउ मणे लिहति ॥ जमु दंसणे अणुवय के विलिति, जिणु छांडव अन्यहि मणुर्णाविति ॥
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- ( जंबुसामिचरिउ, संधि १, १७)
***
- (करकंडुचरिउ, संधि ६, १ )
इस पाठांश में 'जसु....संरचना का आवर्तन हुआ है । 'मयणपराजय' में भी यह स्थिति देखने को मिलती है
- ( गावकुमारचरित संधि १,१)
कमल कोमल कमलकंतिल्ल
कमलंकिय कमलगय कमलहणणसिहरेण अंचिय ।
कमलापिय कमलापिय कमलमवहि कमलेहि पुज्जिय ।
न केवल पदबन्धों का वरन् रूपिम का भी आवर्तन कवि ने किया है । वर्णत प्रसंग में इस प्रकार का संरचना आवर्तन अपभ्रंश के चरिउकाव्यों की विशेषता है। वर्णन प्रसंग से प्रतिबद्ध होने के कारण यह संरचना प्रयोग अपभ्रंश'काव्यों का एक शैलीचिह्नक है ।
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कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड
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सम्दर्भ २: वैराग्य भाव
__ अपभ्रंश चरिउकाव्यों में वैराग्यभाव का वर्णन एक अपरिहार्य सन्दर्भ है। चरिउकाव्यों के मोटिफ का यह महत्त्वपूर्ण कथ्य-अंग है । जहाँ भी वैराग्य भाव के उदय का प्रसंग आया है, दुःख की अधिकता, मृत्युलोक की भीषणता, शरीर-भोगजन्य बन्धन, सुख की अत्यल्पता सर्वत्र कथित है। कतिपय उदाहरण देखें१. हु महुविन्दु सम, दुहु मेरू सरिस पवियम्मइ ।
-(पउमचरिउ, २२, २) रयणायरतुल्लउ जेत्थ दुक्खु महुविन्दुसमाणउ भोयसुक्खु । -(करकंडुचरिउ, ६, ४) इन अलंकार रचनाओं में सुख की तुलना 'मधुविन्दु' से एवं दुःख की तुलना 'मेरु' पर्वत तथा 'सागर' से की गई है। 'मधुबिन्दु' अपभ्रंश काव्यों की कथानक रूढ़ि है और मोटिफ के मूलभाव को पुष्ट करने के लिए इसका प्रयोग किया गया है। जहाँ भी ये रचनाएँ प्रयुक्त हुई हैं उपमासूचक रूपिम इनमें अनिवार्यतः है। अतएव यह उपमा संरचना इस प्रसंग में सन्दर्भबद्ध हो गई है। सन्दर्भ ३ : पूर्वजन्म का स्मरण
भवान्तर स्मरण के प्रसंग से ज्ञानोपलब्धि अपभ्रंश चरिउकाव्यों में वर्णित है। पउमचरिउ में भामंडल का प्रसंग है
पत्त वियडढ पुरू तं णिएवि जाउ जाईसरू । अण्णहि भव गहणे हउं होन्तु एत्थु रज्जेसरू ।
मुच्छाविउ तं पेखेंवि पएसु संभरेंवि भवन्तरु णिखसेसु ॥ भामण्डल' पूर्वजन्म के वृत्तान्त का स्मरण का वैराग्य प्राप्त करता है और 'जंबुसामिचरिउ' में सागरचन्द पूर्वजन्म के वृत्तान्त को जानकर दीक्षा ग्रहण करता है
तुहु अणुउ रासि जो सो वि बुहु चक्कबइमहापउ मंग रूहु । अहिहाणे सिवकुमारू अभउ इह कहिउ भवन्तरू सिन्धुलउ ।
-(जं० सा० चरिउ, ३, ५) इन प्रसंगों में रूपिमों का आवर्तन होता है। कर्ममूचक 'उ' विभक्तियुक्त, 'भवन्तरू' पद का आवर्तन इस विशेष प्रसंग में हुआ है। यह प्रसंग भी अपभ्रंश चरिउकाव्यों के मोटिफ का प्रत्यापक है। जैसाकि स्पष्ट है कि अपभ्रंश काव्यों में सन्देश की प्रवृत्ति का प्रेरक आवेग है। 'मयणपराजयचरिउ' तो स्पष्टतः (प्रतीकों का आश्रय लेते हुए भी) सन्देश है । सभी अपभ्रश काव्यों का मोटिफ एक ही है, अन्तर उसके विस्तार में है । कवि के कवित्व का दर्शन उसके द्वारा प्रयुक्त भाषिक संरचनाओं में व्यक्त उसकी कल्पना में होता है । यह स्थिति इतनी स्पष्ट है कि अपनी कल्पना के आवेग को रचयिता वर्णन के प्रसंग में धारा की भाँति प्रवाहित करता है, परिणामतः एक ही संरचनाओं का आवर्तन जलावों के समान होता है, एक निश्चित गति से, निश्चित दिशा में। अतएव, सन्दर्भो में निश्चित संरचना का आवर्तन कवि की दृष्टि का परिचायक है । 'जंबुसामिचरिउ' के निम्नलिखित प्रसंग को देखें
१. जालियाउ गयवइहिययहि सहुं उडुइ नहंगणे मयलंछणु लहु ।
भमिए तमंधयार बरअच्छिए, दिण्णउ दीवउ णं नहलच्छिए । १. जोण्णहारसेण भुवणु किउ सुद्धउ खीरमहण्णवम्मि णं छुखउ । ये दोनों उत्प्रेक्षा संरचनाएँ हैं । चन्द्रमा की किरणें धरती पर बरस रही हैं उस सौन्दर्य से कवि के मन में जो आनन्द का आवेग उत्पन्न होता है उसे निम्नलिखित 'कि............' संरचना के आवर्तन में साकार होता देखा जा सकता है
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अपभ्रंश चरिउकाव्यों को भाषिक संरचनाएँ
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किं गयणाउ अमियलवविहहि । कि कप्पूरपूरकण निडिहिं । कि सिरिखंड बहलरमसीयर ।
मयरद्धयबंधवससहरकर ॥ 'कि"...""संरचना का यह आवर्तक कवि के आवेग का परिचायक है। करकंडुचरिउ में 'मानो' संरचना का आवर्तन है
गुरुघायवडणे णिग्गय फुलिंग णं कोहवसई अहिजललिंग। तहे गंठिहे वयणहो बहलकार ता णिग्गय तक्खणि सलिलधार । पढमउ भुभुक्कइ णिग्गमेइ णं मेइणि भीए उव्वमेइ । णिग्गंती बाहिरि सा विहाइ महि भिदिवि फणिवइधरिणि पाइँ॥
परिसहइ सावि भूमिहिं मिलंति गंगाणइ णं खल खल खलंति ।-(करकंडुचरिउ,४-१४) विशेषता इन संरचनाओं में प्रयुक्त शब्दों के चयन की है। उपर्युक्त प्रसंग में 'णं........' संरचना का आवर्तन है। 'णायकुमारचरिउ' का निम्नलिखित उद्धरण इस बात को सिद्ध करता है कि अपभ्रंश काव्यों के अधिकांश वर्णन प्रसंगों में अलंकार संरचना (णं.......) आवर्तित हुई है
णं घरसिहरग्गहि सग्गु छिवइ णं चंद अमियधाराउ पियइ । कुंकुमछडए णं रइहि रंगु णावइ रक्खालिय सुहपसंगु।
विरइय मोत्तिय रंगावलीहिं जं भूसिउ णं हारावलीहि । -(णायकुमारचरिउ, १) कभी एक ही कथ्यांश के लिए अनेक उत्प्रेक्षा संरचनाएँ प्रयुक्त की जाती हैं। कभी एक कथ्य के विविध परिप्रेक्ष्यों को आवर्तित उत्प्रेक्षा संरचनाओं में उजागर किया जाता है, वर्णन के प्रसंगों की यह सामान्य प्रवृत्ति है। णायकुमारचरिउ में कवि एक उपवाक्य में अनेक पदबन्धों का मध्य प्रशासन (Mid Branching) करता है, इस प्रकार अनेक क्रियाविशेषणों का नियोजन शीघ्रतापूर्वक होने वाले अनेक परिवर्तनों अथवा क्रियाओं को चित्रात्मकता के साथ प्रस्तुत करता है। इन पदबन्धों में प्रयुक्त शब्दावली भी चयन का प्रमाण है, संरचना भी समान है अतएव आवतित भी
घडहडइ कडयडइ, कोवेण तायडइ। लोहेहि सिक्खवइ, मायाउ दक्खवइ ।
माणेण कयघट्ट, कयसोउ बहु दट्ट । -(मयणपराजयचरिउ, २. ५१) इस उद्धरण में १, २, ३, ४, पदबन्ध हैं, ६ प्रमुख क्रियापदबन्ध है। व्यक्ति उच्छलित भावों की अभिव्यक्ति में भी संरचना-आवर्तन-विधान देखा जा सकता है। अपभ्रंश के कवियों ने इस संरचना-प्रकार का भी प्रयोग किया हैं । मयणपराजयचरिउ में बन्दी (दूत) कहता है
वज्जघाउ को सिरिण पडिच्छइ । असिधारापहेण को गच्छइ ।। को जमकरणु जंतु आसंघइ । को भुवदंडई सायर, लंघइ ॥ को जममहिससिंह उप्पाडइ । विफ्फुरंतु को दिणमणि तोडइ । आसीविसमुहि की करू छोहइ । धगधगंत धुववहि को सोवइ ॥
Bato
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कर्मयोगी श्री केसरीमलगी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड
एक ही कथ्य को विविध प्रकार से कहा गया है, किन्तु सभी कथनों की भाषिक संरचना समान है। "कौन हैं....जो ऐसा करें" संरचना का प्रतिपाद्य यहाँ निषेधात्मक है । बन्दी (दूत) के वचनों को सुन्दर ताल ठोककर मदनराज अपने सामन्तों के साथ यहाँ से चल पड़ा, मानों समुद्र उछल पड़ा, मानों समुद्र उछल उठा हो । उसकी चलने की अनिवार्यता के वर्णन में कवि पुनः उपर्युक्त संरचना का ही प्रयोग करता है---
विसहरु पुप्फुवंतु को छिदइ। फुफकारते हुए सर्प को कौन रोकता है कहकर कवि ने मदनराज की स्थिति प्रकट कर दी है। अर्थात् सर्प फुफकारता रहे उसे कोई नहीं रोकता, वैसे ही मदनराज को कौन रोकता, वह क्रुद्ध होकर चल पड़ा। मदनराज के प्रति कवि की भावना व्यक्त हो जाती है। कविकृत चयन, वस्तुत: उसकी दृष्टि से प्रभावित होता है अतएव भाषिक संरचना से कवि के मानस तक पहुँचा जा सकता है, यह निर्विवाद है। एक ही पाठ में संरचना का आवर्तन विविध कथ्यों के लिए भी किया जा सकता है, किन्तु ये विविध कथ्य भी एक घटना से संबद्ध होने के कारण परस्पर संसक्त हो जाते हैं, 'मयणपराजयचरिउ' का यह प्रसंग द्रष्टव्य है
जिम जिम सिय-भेरीरव गजहि । तिम तिम पंच कुदंसण भजहि ॥ जिम जिम पंच महब्वय दुहिं । तिम तिम पंचिदिय मणि संकहिं ।। जिम जिम धम्मणिवह संचल्लाह । तिम तिम कम्मणिवह मणि सल्लहिं ।। जिम जिम सत्त तत्त चम्मक्काहि । तिम तिम सत्त महाभय संकहि ।। जिम जिम पायाच्छित पयहि । तिम तिम सल्लतय ओहदहिं ।। जिम जिम चारित्तोहु पयासइ ।
तिम तिम दिढ पमायबलु णासइ ।। -(मयणपराजयचरिउ, २-६६) इस संरचना का प्रयोग कारण-कार्य के त्वरित सम्बन्ध की अभिव्यक्ति के लिए किया जाता है अर्थात ज्योंही अमुक घटना घटी त्योंही दूसरी घटना भी। दूसरी घटना प्रथम घटना के परिणामस्वरूप है, यदि प्रथम न घटती तो द्वितीय भी न घटती । परन्तु विविध प्रसंगों के अवलोकन से सिद्ध हो जाता है कि अपभ्रंश का रचनाकार सामान्यतः समान संरचना के आवर्तन का अभ्यस्त है । भाषिक संयन्त्र का अभ्यस्त एवं पुनरावर्तित प्रयोग ही शैली है। अतएव यह भाषिक-प्रयोग अपभ्रंश चरितकाव्य की शैली का विशेष पक्ष है। मयणपराजयचरिउ में अलंकार संरचनाएँ लगभग नहीं हैं, परन्तु आवर्तन का विधान अवश्य है । समान संरचना वाले पदबन्धों का मध्यप्रशासन भी इन चरिउकाव्यों में प्रवृत्ति के रूप में दिखलाई पड़ता है, इस विधान में अलंकरण नहीं है, सरल पदबन्ध हैं
णरजम्मलद्धण, भावए विसुद्धेण, जिणपुज्ज जो करइ, मुनिचरण मणे धरइ । सज्झाउ अणुसरइ, संजमई संचरइ ।
तवणियमभारेण, दिण गमइ सारेण । -(करकंडुचरिउ, ६-२०) यह ठीक है कि गद्य संरचना और काव्य-संरचना में अन्तर होता है, किन्तु काव्य में भी उपवाक्य तो होते ही हैं, यह अलग बात है कि छन्दानुरोध से उन्हें चरणों में तोड़कर लिखा जाय । परन्तु प्रशासन की प्रवृत्ति, पदबन्ध प्रयोग की प्रवृत्ति आदि विशेषताओं का प्रत्यायन तो उनमें होता ही है। एक विशेष बात यह है कि अपभ्रंश की इन संरचनाओं से कालांतर में विकसित गद्य संरचना का भी बहुत स्पष्ट आभास होता है।
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एक और बहुप्रयुक्त संरचना प्रकार है
"विशेषण
"
"1
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कर्त्ता (प्रतीक रूप में ) प्रमुख क्रिया । जंबुसामिचरिउ में इस संरचना का प्रयोग देखें-
भग्गभूवल्लिसोहो सामियालयालिमालो
अपभ्रंश चरिउकाव्यों की भाषिक संरचनाएँ
हरियाहरपालवारणच्छा
हवचंदन सिलयपराई
अहली कयपुफ्फपरिणामो ॥ रिवरमणीरष्मजोव्ययणे । कोहदुब्वायवेउ नरवइणो जस्स निव्वडिओ ||
।। गय दियहा ।।। जोव्वणु ल्हसिउ देव ।। ।। गइ तुट्टिय विहडिय सन्धिबन्ध ।। लोयण णिरन्ध ||
।। ण सुणन्ति कण्ण ।।
।। सिरु कंपई ।। मुहे
पक्खलइ वाम ।।
।। गय दन्त । । सरीर हो गट्ठ छाय ।।
(१-११-४-५)
अधिकांशतः वैशेषिक संरचनाओं का प्रयोग अपभ्रंश काव्य में हुआ है । किन्तु जहाँ सामान्य संवाद है अथवा कथा-प्रवाह है, वहाँ सीधी-सरल संरचनाएँ हैं। जहाँ व्यक्ति की मानसिकता व्यक्त की गई है, वहाँ भी यही स्थिति है और यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि व्यक्ति अलंकार-संरचनाओं में चिन्तन नहीं करता, दुःख अथवा ग्लानि के वैचारिक संदर्भ में भी अलंकार संरचनाओं का प्रयोग विरल ही है । पउमचरिउ में कंचुकी अपनी अवस्था का वर्ण करता है—
के दिवस वि होसह आरिसा
कञ्चइ अवस्थ
अम्हारिसा ।। को हवं, का महि, कहो तदब्बु । सिहासणु छत्तई अथिरु सब्बु । जोम्बणु सरीद जीवि धिगत्यु संसारु असारु अणत्थु अत्थु ॥ विसु विसय बन्धु दिढ बन्धणाई । घर दारइ परिभव कारणाई ॥
उपवाक्य
"1
++
27
और कंचुकी के इन लघु, पर व्यंजक उपवाक्यों को सुनकर दशरथ को जीवन से ग्लानि हो जाती है, परिणामतः वैराग्य होता है, दशरथ की विचार तरंगें भी इसी प्रकार के लघु वाक्यों में व्यंजित है, पूरा पाठांश इन्हीं संरचनाओं का गुच्छ है। यद्यपि से पृथम्-पृथक् उपवाक्य से लगते हैं, पर कथ्य इन्हें परस्पर संसक्त कर देता है। ऐसी संरचना व्यक्ति के मन में होती ऊहापोह की व्यंजना हेतु समुचित होती है
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जहाँ ऐसी स्थिति में भी अलंकार संरचना का अधिक प्रयोग होता है, वहाँ यह मानना होगा कि रचयिता ही पात्र के चरित्र में मुखर हो रहा है तब उस प्रसंग में कृत्रिमता का आभास भी स्पष्ट होगा । सम्पूर्ण चरिउ काव्यों के अवगाहन से इन काव्यों में प्रयुक्त संरचनाओं का उद्घाटन किया जा सकता है। भाषा की प्रत्येक संरचना का अपना
obo os too
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0.
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कर्मयोगी श्री केसरीमलजी सुराणा अभिनन्दन ग्रन्थ : पंचम खण्ड
प्रयोजन होता है । शब्द चयन की ही भांति भाषिक संरचना भी यादृच्छिक नहीं होती । कालविशेष में या काव्य प्रवृत्तिविशेष में भाषा में कुछ विशेष संरचनाएँ उस प्रवृत्तिविशेष के शैली चिह्नक के रूप में पहचानी जाने लगती हैं। आवर्तन की दृष्टि से, सर्वाधिक आवर्तित संरचनाएँ जो अपभ्रंश काव्य में उपलब्ध होती हैं, का निबन्धन निम्नलिखित प्रकार से किया जा सकता है। यही संरचना नहीं है, इनके अतिरिक्त भी है, यह प्रस्तुतीकरण आवर्तन और समानान्तरता की दृष्टि से है ।
(१) पात्र के रूप, आकृति अथवा गुण वर्णन में अलंकार संरचनाओं का आवर्तन रूप, गुण अथवा आकृति के सौन्दर्य से प्रभावित रचयिता - मानस के आबेग की सूचना इन संरचनाओं से मिलती है, इस संरचना का सूत्र है
णं + कर्ता + अथवा शियापद +
3
कर्म + क्रिया
+ विशेषण पद
कथ्य
णं
(२) द्वितीय संरचना किं
के आवर्तन वाली है, वक्ता-मानस के संभ्रम की सूचक है। इसमें सामान्यतः अलंकार संरचना का अन्तर्भाव रहता है, क्योंकि एक उपमेय के लिए अनेक उपमान उपवाक्यों का प्रयोग होता है । क्योंकि कथ्य एक रहता है, इसलिए संरचना भी समान होती है
[ किं. कि
कि"
( किं
आवेगपूर्ण संभ्रम की व्यंजना इस संरचना की विशेषता है।
(३) तृतीय प्रकार की संरचना का सूत्र है-
क्रियाविशेषण + क्रिया+कर्ता + विशेषण पदबन्ध
विशेषण पदबन्ध+
यह संरचना ज्ञात कर्ता की नई-नई विशेषताओं का क्रमशः उद्घाटन करती है। प्रारम्भ में सरल वाक्य होता है, विशेषण पदबन्धों में रूपक अथवा उत्प्रेक्षा संरचना होती है। ज्ञात घटना से कर्ता की अब तक अज्ञात विशेषताओं का प्रत्यक्षीकरण होता है ।
(४) चतुर्थ प्रकार की बहुप्रयुक्त संरचना है—
विशेषण पदबन्ध + विशेषण पदबन्ध +
१
कर्ता + क्रिया
ससा दोणरायस्स भग्गाणुराया, तुलाकोडि कंति लयालिद्धपाया । स पालम्ब की यहा मिष्ण गुरुक्षा, धगतुंगमारेणजाणित्तमन्शा | णवासोय वच्छच्छ्याछाय पाणी वरालाविणी - कोइलालाववाणी । महामोरपिछोह संकाय केसा, अगंगस्स भल्ली वपच्छष्णयेसा | केवकया अत्थाण-मग्गो ||
जत्थ
गया
(५) पाँचवीं संरचना प्रश्नवाचक को है, इसका प्रतिपाद्य या तो निषेधात्मक होता है, या पात्र की मूर्खता का सूचक | इसका सूत्र है -
को............कर्म + क्रिया
कर्ता स्वयं 'को' में निहित होता है। होता है - ऐसा कौन करता है/कर सकता है,
(६) छठी आवर्तित संरचना है
संरचना का कर्म + क्रिया अंश असम्भव कार्य के सूचक होते हैं, अर्थ भावार्थ होता है 'कोई नहीं, जो करता है वह प्रमादी होता है
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________________ अपभ्रंश चरिउ काव्यों की भाषिक संरचनाएँ 506 -.-.-.-. -.-.-.-.-.-.-.-.-.-.-. -.-.-.-.-.-.-. -.-.-. -. -. -. -.-.-.-. -.-.-. -... जिम............ तिम............ यह कारण-कार्य की सूचक संरचना भी होती है और अलंकार (उपमा) की सूचक भी। (7) सातवीं संरचना है जिसमें विशेषण उपवाक्यों का आवर्तन होता है विशेषण उपवाक्य, ....."+"...."वि० उपवाक्य,....."+कर्ता प्रतीक रूप में+......"क्रिया / (8) आठवीं संरचना है-लघु उपवाक्यों के ग्रन्थनवाली / इसमें अनेक संरचनाएँ मिश्रित होती हैं (क) कर्ता+सहायक क्रिया-को हउं / (ख) कर्म+क्रिया-१. जीविउ धिगत्थु / 2. संसारु असार / 3. णय दंत / इस प्रकार संरचनाओं के आकलन से अपभ्रंश चरिउकाव्यों के कथ्य का वैशिष्ट्य तो उद्घाटित होता ही है, रचयिता-मानस भी उजागर होता है। अब तक इन काव्यों का अध्ययन अनेक दृष्टियों से किया गया है, संरचना और कथ्य के सम्बन्ध की दृष्टि से तथा संरचना-आवर्तन और समानान्तरता-विधान के परिप्रेक्ष्य में इन काव्यों का अध्ययन नहीं किया गया। इस दिशा में संकेत देने का एक अत्यल्प प्रयास प्रस्तुत लेख में किया गया है / आवश्यकता इस बात की है कि समग्र चरिउकाव्यों और अन्य काव्यों का इस सन्दर्भ में विस्तृत परीक्षण किया जाय। यदि ऐसा हो, तो ऐसी अनेक संरचनाओं को प्रकट किया जा सकेगा जो परवर्ती काव्य को प्रभावित करती रही हैं। यह भी ज्ञात हो सकेगा कि अपभ्रंश काव्य ने संरचना-सन्दर्भ में कितना कुछ संस्कृत शैली से ग्रहण किया है। यह अपभ्रंश-काव्य के अध्ययन की दिशा में एक नया चरण होगा। इससे अपभ्रंशकाव्य का विश्लेषण वस्तुनिष्ठता से किया जा सकेगा, क्योंकि इसका आधार भाषावस्तु होगा।