Book Title: Agna Stotra Author(s): Kalyankirtivijay Publisher: ZZ_Anusandhan Catalog link: https://jainqq.org/explore/229578/1 JAIN EDUCATION INTERNATIONAL FOR PRIVATE AND PERSONAL USE ONLYPage #1 -------------------------------------------------------------------------- ________________ आज्ञा- स्तोत्र सं. मुनि कल्याणकीर्तिविजय आचार्य श्रीजिनप्रभसूरि - विरचित प्राकृतभाषामय आ आज्ञास्तोत्रमां जिनेश्वर भगवंतनी आज्ञानुं स्तवन करवामां आव्युं छे तेमज आज्ञानी आराधना करनारने केवा लाभो थाय छे अने आज्ञानी विराधना करनारने केवा नुकसान थाय छे - तेनुं पण संक्षिप्त वर्णन करवामां आव्युं छे । · स्तोत्रना अंते लखायेल पुष्पिकाथी जणाय छे के आ प्रतिनुं लेखन वि.सं. १७१७नी ज्येष्ठ सुदि १३ ने दिने शुक्रवारे थयेल छे । आज्ञा - स्तोत्र नयगमभंगपहाणा विराहिआऽऽराहिआ वि सपमाणा । भवसिवदाणसमाणा जिणवरआणा चिरं जय ॥१॥ इक्क च्चिअ तुह आणा दुहं सुहं देइ सामिअ ! अनंतं । इक्का वि मेहवुट्टी विसं व अमियं व पत्तगुणा ॥२॥ भमिओ भवो अणतो तुह आणाविराहिएहिं जीवेहिं । पुण भमिअव्वो तेहिं जेहिं न अंगीकया आणा ||३|| जो न कुणइ तुह आणं सो आणं कुणइ तिहुअणस्साऽवि । जो पुण कुणइ जिणाणं तस्साऽऽणा तिहुयणे देवा (या ) ||४|| तं पुत्रं पडिपुत्रं तं मइनिउणं अणोवमं सामि ! 1 जेणं जिणनाह ! तुमं जाणिज्ज जहद्विआ आणा ||५|| नरयगई विहु सग्गो तुहआणाभाविआण भविआणं । सग्गो वि नरयअहिओ जिणवर ! आणाविमुक्काणं ||६|| तुहआणाभट्ठाणं तिलोअलच्छीइ नाह न हु सुक्खं । आणाजुत्ताणं पुण न देइ दुक्खं दरिदं पि ||७|| Page #2 -------------------------------------------------------------------------- ________________ 40 अनुसंधान-२१ तह जिणवरिंद ! आणा विराहिआ जं पमायदोसेणं / भवभमंतेणं मए तं मिच्छादक्कडं होउ // 8 // निउणमईगम आणा ववहारेणं न नज़्जई कह वि / निच्छयओ पुण नियमा तुह जिण ! भणिों पमाणं मे // 9 // मिच्छत्ततावतत्तो पत्तो तुहआणनिरुवमच्छायं / ता तत्थ कुण पसायं सामिअ ! विस्सामदाणा(णे)णं // 10 // इय वित्रत्तो जिणपहु जिणपहसूरीहिं जगगुरू पढमो / विनत्तीइ पसायं निविग्घं कुण[उ] अम्हाणं // 11 // // इति श्रीस्तवनसम्पूर्णः // संवत् 1717 वर्षे ज्येष्ठ सुदि 13 वार सकरे लखितं ॥छ।।